The Hindu: 27 फरवरी 2026 को प्रकाशित
भारत के सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय, जिसमें एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक Exploring Society: India and Beyond पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है, ने राष्ट्रीय स्तर पर तीखी बहस छेड़ दी है। विवाद का केंद्र एक ऐसा अध्याय है, जिसमें न्यायपालिका की भूमिका और उसकी चुनौतियों पर आधारित व्यापक पाठ के हिस्से के रूप में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” पर चर्चा की गई है।
न्यायालय ने न केवल पुस्तक के आगे के प्रकाशन और प्रसार पर रोक लगाई, बल्कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) तथा स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों के खिलाफ स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लेते हुए अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की।
यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायपालिका की गरिमा, शैक्षणिक स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों के बीच के नाजुक संतुलन को छूता है। यह मुद्दा केवल प्रतिबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संस्थागत आलोचना, शक्तियों के पृथक्करण और भारत में शैक्षणिक विमर्श की सीमाओं जैसे गहरे प्रश्न भी उठाता है।

यह चर्चा में क्यों है?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक रिपोर्ट में बताया गया कि हाल ही में जारी की गई कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार पर एक खंड शामिल था। सुप्रीम कोर्ट ने 25 फरवरी को इस रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लिया और बिना किसी औपचारिक याचिका के स्वयं मामला दर्ज किया।
सुनवाई के दौरान, भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कड़ी टिप्पणियाँ कीं और पाठ्यपुस्तक की सामग्री को न्यायपालिका की गरिमा और अधिकार को कमजोर करने के उद्देश्य से रची गई “गहरी जड़ें जमाए, सुव्यवस्थित साजिश” बताया। न्यायालय ने स्थिति की तुलना एक “गोली चलने” से की, जिससे न्यायपालिका “रक्तस्राव” कर रही है; जो इस मामले को लेकर उसकी गंभीरता को दर्शाता है।
इसके बाद न्यायालय ने निम्नलिखित आदेश दिए:
इन निर्देशों की व्यापकता और पीठ द्वारा प्रयुक्त भाषा ने इस मामले को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और शैक्षणिक मुद्दा बना दिया है।
विवादित अध्याय की सामग्री
रिपोर्ट के अनुसार, अध्याय में निम्नलिखित विषयों पर चर्चा की गई थी:
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अध्याय “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” पर आधारित एक व्यापक पाठ का हिस्सा था। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रणाली की शक्तियों (सकारात्मक पक्ष) और चुनौतियों दोनों को प्रस्तुत करना था।
हालाँकि, न्यायालय ने इस सामग्री पर आपत्ति जताई। न्यायालय का मानना था कि यह प्रस्तुति न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका; विशेष रूप से मूल संरचना सिद्धांत और संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखने में उसकी भूमिका; को पर्याप्त रूप से रेखांकित किए बिना उसे कमतर दिखाने का प्रयास करती है।
मुद्दे के विधिक आयाम
1. न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court)
न्यायालय ने Contempt of Courts Act के तहत कार्यवाही की संभावना का उल्लेख किया। आपराधिक अवमानना में ऐसी किसी भी प्रकाशन को शामिल किया जाता है जो किसी न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचाए या उसकी प्राधिकारिता को कम करे।
यहाँ मुख्य प्रश्न यह है कि क्या तंत्रगत (systemic) समस्याओं पर शैक्षणिक चर्चा को “न्यायपालिका की बदनामी” माना जाएगा, या वह वैध आलोचना (legitimate criticism) की श्रेणी में आएगी?
भारतीय न्यायालयों ने ऐतिहासिक रूप से यह माना है कि न्यायिक कार्यप्रणाली की निष्पक्ष और तर्कसंगत आलोचना स्वीकार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने आदेश में कहा कि उसका उद्देश्य वैध आलोचना या लोकतांत्रिक विमर्श को दबाना नहीं है। हालांकि, न्यायालय ने पाठ्यपुस्तक की सामग्री को सद्भावनापूर्ण आलोचना (bona fide critique) से आगे जाने वाला बताया।
इससे एक संवैधानिक तनाव उत्पन्न होता है: वैध आलोचना कहाँ समाप्त होती है और अवमानना कहाँ से शुरू होती है?
2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शैक्षणिक स्वायत्तता
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यद्यपि शैक्षणिक स्वतंत्रता का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, परंतु इसे सामान्यतः इसी अधिकार का हिस्सा माना जाता है।
एनसीईआरटी, एक स्वायत्त शैक्षणिक संस्था के रूप में, ऐसी शैक्षिक सामग्री तैयार करने के लिए जिम्मेदार है जो संवैधानिक मूल्यों और आलोचनात्मक चिंतन को प्रतिबिंबित करे।
इस प्रतिबंध ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या पाठ्यपुस्तक की सामग्री में न्यायिक हस्तक्षेप शैक्षणिक स्वायत्तता पर अतिक्रमण है। आलोचकों का तर्क है कि संस्थागत चुनौतियों को स्वीकार करना जागरूक नागरिकता को बढ़ावा देता है। वहीं, न्यायालय के निर्णय के समर्थकों का कहना है कि नाबालिग छात्रों को ऐसी सामग्री के संपर्क में नहीं लाया जाना चाहिए जो संवैधानिक संस्थाओं में विश्वास को कमजोर कर सकती है।
3. शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
यह विवाद शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को भी स्पर्श करता है। न्यायपालिका लोकतंत्र का एक स्वतंत्र स्तंभ है, जिसे संविधान की व्याख्या करने और अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया है। दूसरी ओर, कार्यपालिका; एनसीईआरटी जैसी संस्थाओं के माध्यम से; शैक्षिक नीति का निर्माण करती है।
जब न्यायपालिका सीधे तौर पर पाठ्यपुस्तक की सामग्री में हस्तक्षेप करती है और राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में पुस्तकों की जब्ती का आदेश देती है, तो यह न्यायिक पुनरावलोकन (judicial review) और प्रशासनिक शासन के बीच की सीमाओं पर प्रश्न खड़े करता है।
हालांकि, आदेश के समर्थकों का तर्क है कि जब न्यायपालिका की गरिमा दांव पर हो, तो संस्थागत अखंडता की रक्षा के लिए न्यायालय को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।

व्यापक लोकतांत्रिक संदर्भ
भारत का लोकतंत्र संस्थागत विश्वास पर आधारित है। न्यायपालिका को अक्सर “संविधान का संरक्षक” कहा जाता है। वर्षों से उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है:
ऐसे विषयों को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करना संभवतः विद्यार्थियों को वास्तविक शासन संबंधी चुनौतियों से परिचित कराने का प्रयास हो सकता है। हालांकि, न्यायालय की चिंता यह प्रतीत होती है कि प्रस्तुतीकरण में संतुलन और संदर्भ की कमी थी, जिससे संवेदनशील युवा मनों के बीच न्यायपालिका की सार्वजनिक छवि प्रभावित हो सकती थी।
लोकतंत्र में शिक्षा की भूमिका
आधुनिक नागरिक शिक्षा का उद्देश्य है:
कई लोकतांत्रिक देशों में पाठ्यपुस्तकें सरकारी संस्थाओं की तंत्रगत समस्याओं; जैसे भ्रष्टाचार और अक्षमता; पर चर्चा करती हैं, साथ ही सुधार के उपायों और संवैधानिक सुरक्षा तंत्रों पर भी बल देती हैं। आलोचना और सम्मान के बीच संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि एनसीईआरटी के अध्याय में चुनौतियों को न्यायिक सुधारों और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के व्यापक ढांचे में पर्याप्त संदर्भ के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया, तो इससे एक पक्षीय (one-sided) कथा निर्मित हो सकती थी। हालांकि, संशोधन के बजाय पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने को कुछ टिप्पणीकारों ने एक कठोर सुधारात्मक कदम के रूप में देखा है।
एनसीईआरटी और स्कूल शिक्षा पर प्रभाव
न्यायालय के निर्देशों ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक और विधिक दायित्व उत्पन्न किए हैं:
साथ ही, यह निर्णय यह संकेत भी देता है कि संवैधानिक संस्थाओं से संबंधित विषयों पर चर्चा करते समय संस्थाओं को उच्च स्तर की जिम्मेदारी और संतुलन बरतना होगा।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
यद्यपि यह मामला न्यायिक है और प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक नहीं है, फिर भी इसने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक ध्यान आकर्षित किया है। भारत में शैक्षिक सामग्री लंबे समय से वैचारिक बहस का केंद्र रही है। इतिहास, नागरिक शास्त्र और सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रमों पर विवाद अक्सर व्यापक राजनीतिक विमर्श को प्रतिबिंबित करते हैं।
वर्तमान प्रकरण एक नया आयाम जोड़ता है—पाठ्यपुस्तकों में प्रतिनिधित्व को लेकर न्यायपालिका की संवेदनशीलता। यह भविष्य में पाठ्यपुस्तक सुधारों और सामग्री की समीक्षा प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। नागरिक समाज भी इस मुद्दे पर विभाजित है:
तुलनात्मक दृष्टिकोण
वैश्विक स्तर पर, पाठ्यपुस्तकों की सामग्री को लेकर बहसें आम हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में स्कूल बोर्ड अक्सर यह चर्चा करते हैं कि संस्थाओं, ऐतिहासिक घटनाओं और तंत्रगत कमियों को किस प्रकार प्रस्तुत किया जाए।
हालांकि, न्यायालय द्वारा सीधे पाठ्यपुस्तकों पर प्रतिबंध लगाना अपेक्षाकृत दुर्लभ है, और आमतौर पर यह संवैधानिक उल्लंघन या घृणास्पद भाषण (hate speech) जैसे मामलों से जुड़ा होता है। भारतीय मामला इसलिए विशिष्ट है क्योंकि यहाँ स्वयं न्यायपालिका ही प्रभावित संस्था है।
यह एक अनोखी स्थिति उत्पन्न करता है, जहाँ न्यायपालिका एक साथ निर्णायक (adjudicator) और प्रभावित पक्ष (affected party) दोनों की भूमिका में दिखाई देती है। इससे निष्पक्षता और संस्थागत आत्म-सुरक्षा से जुड़े सूक्ष्म प्रश्न उठते हैं।
उठाए गए प्रमुख संवैधानिक प्रश्न:
ये प्रश्न सुनिश्चित करते हैं कि यह मुद्दा सार्वजनिक विमर्श में प्रमुख बना रहेगा।
दीर्घकालिक प्रभाव
निष्कर्ष