परिसीमन और संसदीय सीटों पर:

परिसीमन और संसदीय सीटों पर:

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द हिंदू: 20 अप्रैल 2026 को प्रकाशित:

 

चर्चा में क्यों?

अप्रैल 2026 में, केंद्र सरकार ने भारत के चुनावी मानचित्र को नया स्वरूप देने के लिए एक महत्वपूर्ण विधायी पैकेज पेश किया। हालांकि, एक दुर्लभ संसदीय घटना में, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक लोकसभा में पारित होने में विफल रहा। इसे पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत मिले, जो कि अनिवार्य दो-तिहाई बहुमत (उपस्थिति के आधार पर लगभग 352-360 वोट) से कम था। परिणामस्वरूप, सरकार ने इसके साथ जुड़े परिसीमन विधेयक, 2026 को भी वापस ले लिया।

 

परिसीमन (Delimitation) क्या है?

परिसीमन प्रत्येक राज्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या और उनकी क्षेत्रीय सीमाओं को निर्धारित करने की प्रक्रिया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रत्येक सीट लगभग समान संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करे।

प्राधिकरण: यह अभ्यास एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग (एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता में) द्वारा किया जाता है।

सीटों का "फ्रीज" (स्थिरता): जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों में सफल रहने वाले राज्यों (मुख्यतः दक्षिण भारत) को राजनीतिक शक्ति खोने से बचाने के लिए, सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दिया गया था। इस रोक को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया गया था।

 

131वें संशोधन विधेयक में प्रस्तावित मुख्य बदलाव:

इस विधेयक ने अगले दशक की भारतीय राजनीति की रूपरेखा बदलने का प्रयास किया था:

सदन का विस्तार: लोकसभा की अधिकतम संख्या को 550 से बढ़ाकर 850 करना।

जनगणना में लचीलापन: संसद को यह निर्णय लेने का अधिकार देना कि किस जनगणना (जैसे 2011 या आगामी 2027) के आधार पर सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाएगा।

महिला आरक्षण में तेजी: महिलाओं के लिए 1/3 आरक्षण (2023 में पारित) को "2026 के बाद की पहली जनगणना" की शर्त से अलग करने का प्रयास, ताकि 2011 के आंकड़ों का उपयोग करके इसे जल्द लागू किया जा सके।

 

सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव क्यों दिया गया?

प्रभावी प्रतिनिधित्व: भारत की जनसंख्या 140 करोड़ से अधिक होने के कारण, सरकार ने तर्क दिया कि वर्तमान 543 सदस्य अत्यधिक बोझ तले दबे हैं। 850 सदस्यों वाले सदन से सांसद-मतदाता अनुपात अधिक प्रबंधनीय स्तर पर आ जाएगा।

महिला कोटे का कार्यान्वयन: सरकार का तर्क था कि कुल सीटों में 50% की वृद्धि (लगभग 816 सक्रिय सीटें) से विस्तारित सदन में महिलाओं के लिए 272 सीटें आरक्षित करना आसान हो जाएगा, जिससे पुरुष सांसदों के पास वर्तमान में मौजूद "सामान्य" सीटों की संख्या में बड़ी कमी नहीं आएगी और राजनीतिक घर्षण कम होगा।

 

विपक्ष द्वारा उठाई गई चिंताएं:

विपक्ष (इंडिया गठबंधन) ने तीन प्राथमिक आशंकाओं के आधार पर विधेयक को हराने के लिए एकजुटता दिखाई:

  1. "दक्षिण भारत का नुकसान": किसी भी हालिया जनसंख्या डेटा (जैसे 2011) का उपयोग बिना सुरक्षा उपायों के करने से उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्यों (जैसे यूपी और बिहार) को भारी बढ़त मिल जाएगी, जबकि दक्षिणी राज्यों (जैसे तमिलनाडु और केरल) का सापेक्ष प्रभाव कम हो जाएगा।
  2. "आनुपातिक (Pro-rata)" वृद्धि पर अविश्वास: हालांकि गृह मंत्री अमित शाह ने मौखिक रूप से 50% आनुपातिक वृद्धि का आश्वासन दिया था (ताकि प्रत्येक राज्य की सीटों में समान प्रतिशत में वृद्धि हो और उनकी सापेक्ष शक्ति बनी रहे), लेकिन यह बात मूल विधेयक के लिखित पाठ में शामिल नहीं थी
  3. "पिछले दरवाजे" से प्रवेश: आलोचकों का तर्क था कि सरकार महिला आरक्षण के लोकप्रिय मुद्दे को एक "ट्रोजन हॉर्स" (ढाल) की तरह इस्तेमाल कर रही है ताकि परिसीमन को जल्दबाजी में लागू किया जा सके, जिससे सत्ताधारी दल के जनसांख्यिकीय गढ़ों को लाभ मिल सके।

 

आगे की राह:

विधेयक की विफलता इस चर्चा को फिर से शून्य पर ले आई है:

आम सहमति का निर्माण: संवैधानिक संशोधन के लिए व्यापक सर्वदलीय समर्थन की आवश्यकता होती है। भविष्य के प्रयासों में संघीय संतुलन की रक्षा के लिए विधेयक के पाठ में स्पष्ट रूप से "आनुपातिक वृद्धि" की गारंटी देनी होगी।

2027 की जनगणना: सरकार ने संकेत दिया है कि आगामी जनगणना में जाति जनगणना भी शामिल होगी, जो भविष्य के परिसीमन विवादों में जटिलता की एक और परत जोड़ देगी।

स्थानीय लोकतंत्र को सशक्त बनाना: विशेषज्ञों का सुझाव है कि संसद का विस्तार महत्वपूर्ण है, लेकिन वास्तविक प्रतिनिधित्व पंचायतों और नगर पालिकाओं को और अधिक सशक्त बनाने में निहित है, जो नागरिकों की दैनिक समस्याओं से सीधे जुड़े होते हैं।

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