द हिंदू: 27 जनवरी 2026 को प्रकाशित:
क्यों समाचारों में है? (Why in News?)
जनवरी 2026 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने यह घोषणा की कि वह 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकल रहा है, जिनमें अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance – ISA) भी शामिल है। अमेरिका का कहना था कि ये संगठन अब उसके राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नहीं हैं।
इस निर्णय से वैश्विक सौर सहयोग के भविष्य को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं, विशेषकर इसलिए क्योंकि ISA का मुख्यालय भारत में है और यह विकासशील देशों में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) क्या है?
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की स्थापना 2015 में भारत और फ्रांस द्वारा पेरिस जलवायु सम्मेलन (COP-21) के दौरान की गई थी।
इसका मुख्यालय गुरुग्राम, हरियाणा (भारत) में स्थित है और इसके 120 से अधिक सदस्य देश हैं।
ISA का उद्देश्य है:
सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना
देशों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में मदद करना
निवेश से जुड़े जोखिम कम करना
तकनीकी क्षमता का विकास करना
ISA स्वयं सौर परियोजनाएँ नहीं बनाता, बल्कि दुनिया भर में सौर ऊर्जा परियोजनाओं को सुगम बनाने का कार्य करता है।
ISA पर अमेरिका के बाहर होने का प्रभाव:
संयुक्त राज्य अमेरिका ने 2021 में ISA की सदस्यता ली थी और लगभग 2.1 मिलियन डॉलर का योगदान दिया था, जो कुल फंड का केवल 1% था।
इसलिए अमेरिका के बाहर होने से ISA की वित्तीय स्थिति या कार्यप्रणाली पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता।
भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि:
चल रही परियोजनाएँ जारी रहेंगी
प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम प्रभावित नहीं होंगे
हालाँकि, अमेरिका के हटने का प्रतीकात्मक प्रभाव अवश्य है, क्योंकि इससे वैश्विक जलवायु सहयोग कमजोर पड़ता है और कुछ क्षेत्रों में निवेशकों का भरोसा कम हो सकता है।
भारत के सौर क्षेत्र पर प्रभाव:
भारत का सौर क्षेत्र इस निर्णय से लगभग अप्रभावित रहेगा क्योंकि:
भारत ने लगभग 144 गीगावाट की घरेलू सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता विकसित कर ली है
सौर उपकरणों का आयात मुख्य रूप से चीन से होता है, न कि अमेरिका से
भारत की सौर परियोजनाएँ घरेलू मांग और दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौतों पर आधारित हैं
इसलिए:
सौर बिजली की कीमतें नहीं बढ़ेंगी
उपभोक्ताओं पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा
निवेश और रोजगार पर प्रभाव:
भारत में सौर निवेश मुख्यत:
घरेलू मांग, सरकारी नीतियों, निजी निवेश पर आधारित है, न कि अमेरिकी सहायता पर।
साथ ही, सौर क्षेत्र में रोजगार सुरक्षित हैं क्योंकि अधिकतर नौकरियाँ:
निर्माण, स्थापना, संचालन एवं रखरखाव से जुड़ी हैं, जो देश के भीतर ही होती हैं।
इसके अतिरिक्त, यदि अमेरिका चीन से आयात कम करता है, तो भारतीय सौर कंपनियों के लिए निर्यात के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
वास्तविक चिंता का क्षेत्र कहाँ है?
इस निर्णय का सबसे अधिक प्रभाव:
अफ्रीकी देशों:
गरीब और विकासशील देशों
पर पड़ सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय वित्त और सहयोग पर निर्भर हैं।
अमेरिका के बाहर निकलने से:
फंडिंग की गति धीमी हो सकती है
निवेशकों की सतर्कता बढ़ सकती है
सौर परियोजनाओं में देरी हो सकती है
जिससे वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण कमजोर पड़ सकता है।
निष्कर्ष:
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन से अमेरिका का बाहर निकलना भारत की सौर ऊर्जा वृद्धि या ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है।
भारत का सौर क्षेत्र मजबूत, प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर बना हुआ है।
हालाँकि, यह निर्णय विकासशील देशों में नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार को धीमा कर सकता है और वैश्विक जलवायु सहयोग को कमजोर कर सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति किसी झटके से अधिक नेतृत्व की परीक्षा है—कि वह वैश्विक सौर परिवर्तन का मार्गदर्शन किस तरह करता है।
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