द हिंदू: 21 जनवरी 2026 को प्रकाशित:
समाचार में क्यों? (Why in News?)
जनवरी 2026 में स्थिति एक गंभीर मोड़ पर पहुँच गई, जब कई तेज़ी से हुई घटनाओं ने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों को मूल रूप से बदल दिया:
पुनः क्षेत्रीय मांग (Renewed Territorial Demand):
कार्यालय में लौटने के बाद, राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड में अपनी 2019 की “रुचि” को एक औपचारिक रणनीतिक अल्टीमेटम में बदल दिया। उन्होंने घोषणा की कि अमेरिका “किसी न किसी तरीके से” इस द्वीप पर नियंत्रण करेगा।
वेनेज़ुएला मिसाल (The Venezuela Precedent):
3 जनवरी 2026 को अमेरिका ने ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व शुरू किया, जिसके तहत वेनेज़ुएला पर सैन्य हमला किया गया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया गया। पश्चिमी गोलार्ध में बल प्रयोग की इस घटना ने यूरोपीय नेताओं को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की धमकियाँ केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि वास्तविक सैन्य संभावना हैं।
आर्थिक दबाव (Economic Coercion):
17 जनवरी 2026 को ट्रंप ने डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड और फ़िनलैंड—इन आठ यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाने की घोषणा की, जो 1 फरवरी से लागू होने थे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि “ग्रीनलैंड की पूर्ण और संपूर्ण खरीद” पर सहमति नहीं बनी, तो 1 जून से ये शुल्क बढ़ाकर 25% कर दिए जाएंगे।
AI के ज़रिये संकेत (AI Escalation):
20 जनवरी 2026 को ट्रंप ने एक एआई-निर्मित तस्वीर साझा की, जिसमें वे ग्रीनलैंड में अमेरिकी झंडा लगाते दिख रहे थे और बोर्ड पर लिखा था—
“ग्रीनलैंड: अमेरिकी क्षेत्र; स्थापित 2026”
इसे ग्रीनलैंड के विलय के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा का संकेत माना गया।
विस्तृत विश्लेषण:
1. रणनीतिक और भू-राजनीतिक कारण
ग्रीनलैंड पर अमेरिका का ध्यान राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्कटिक क्षेत्र में संसाधनों की प्रतिस्पर्धा से जुड़ा है।
ग्रीनलैंड की स्थिति उत्तरी अमेरिका की वायु एवं अंतरिक्ष रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर पिटुफ़िक स्पेस बेस (पूर्व में थ्यूल बेस) के कारण।
ट्रंप का तर्क है कि आधुनिक हथियार प्रणालियों और प्रस्तावित “द डोम” मिसाइल रक्षा प्रणाली के चलते ग्रीनलैंड के “कोण, सीमाएँ और भू-भाग” अमेरिका की सुरक्षा के लिए अनिवार्य हैं।
इसके अलावा, आर्कटिक की बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और दुर्लभ खनिज संसाधनों तक पहुँच संभव हो रही है, जिन्हें अमेरिका रूस या चीन के प्रभाव में जाने से रोकना चाहता है।
2. “नाटो बनाम नाटो” संकट:
यह संकट ऐतिहासिक रूप से अनोखा है क्योंकि पहली बार किसी नाटो सदस्य की संप्रभुता को खतरा गठबंधन के भीतर से ही उत्पन्न हुआ है।
संप्रभुता बनाम सुरक्षा:
नाटो का संस्थापक सदस्य डेनमार्क, अब अपने ही सुरक्षा प्रदाता अमेरिका के दबाव में है। यह नाटो के सामूहिक रक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के मूल सिद्धांत को कमजोर करता है।
निर्भरता का हथियारकरण:
यूक्रेन युद्ध के कारण यूरोप अमेरिकी सैन्य सहायता पर अत्यधिक निर्भर है। ट्रंप इसी “सुरक्षा कवच” को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, यह संकेत देते हुए कि रूस से सुरक्षा तभी मिलेगी जब यूरोप उनके आर्कटिक एजेंडे में सहयोग करेगा।
आंतरिक मतभेद:
यूरोपीय नेताओं की प्रतिक्रिया पहले “हैरानी” और फिर “आघात” की रही। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीयर स्टारमर ने इसे “धमकी” और “पूरी तरह गलत” बताया, लेकिन वे डेनमार्क की रक्षा करते हुए अमेरिकी परमाणु सुरक्षा छतरी खोने का जोखिम भी नहीं उठाना चाहते।
3. आर्थिक और व्यापारिक प्रभाव:
“ग्रीनलैंड टैरिफ” वैश्विक व्यापार तनाव में एक बड़ा उछाल है।
उद्योग पर प्रभाव:
10%–25% शुल्क उपभोक्ता वस्तुओं, मशीनरी और ऑटोमोबाइल पुर्ज़ों पर असर डालेंगे। अमेरिकी स्टील उद्योग पहले ही यूरोपीय स्क्रैप की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता जता चुका है।
यूरोपीय जवाबी कार्रवाई:
यूरोपीय संघ अपने “एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट” (जिसे ‘ट्रेड बाज़ूका’ कहा जाता है) के इस्तेमाल पर विचार कर रहा है। इससे पूर्ण पैमाने पर व्यापार युद्ध छिड़ सकता है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका देगा।
4. अंतर्राष्ट्रीय कानून और नैतिक दृष्टिकोण:
विश्लेषकों ने इस कदम को “हाइब्रिड युद्ध” करार दिया है।
यह आत्मनिर्णय के सिद्धांत को चुनौती देता है, क्योंकि ग्रीनलैंड की स्वायत्त जनता ने “हैंड्स ऑफ ग्रीनलैंड” जैसे प्रदर्शनों के ज़रिये स्पष्ट किया है कि वे किसी सौदे की वस्तु नहीं हैं।
आलोचकों का कहना है कि यदि अमेरिका किसी सहयोगी की ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ता है, तो वह यूक्रेन में रूस या दक्षिण चीन सागर में चीन की आलोचना करने का नैतिक अधिकार खो देता है।
वर्तमान स्थिति और आगे का परिदृश्य:
21 जनवरी 2026 तक, राष्ट्रपति ट्रंप स्विट्ज़रलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच पहुँचे हैं, जहाँ उन्होंने ग्रीनलैंड मुद्दे पर “विभिन्न पक्षों” से बातचीत पर सहमति जताई है।
उन्होंने दावा किया है कि नाटो महासचिव मार्क रुटे “आगे का रास्ता निकालने के लिए प्रतिबद्ध” हैं, लेकिन डेनमार्क और ग्रीनलैंड के अधिकारी अब भी स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि यह क्षेत्र बिक्री के लिए नहीं है।
अब पूरी दुनिया की नजर इस पर टिकी है कि क्या 1 फरवरी की टैरिफ समय-सीमा पश्चिमी गठबंधन में स्थायी दरार पैदा कर देगी या नहीं।