चुनाव से पहले नेपाल की सबसे बड़ी पार्टी में फूट पड़ने पर, चुनाव आयोग ने वैधता विवाद पर फैसला किया:

चुनाव से पहले नेपाल की सबसे बड़ी पार्टी में फूट पड़ने पर, चुनाव आयोग ने वैधता विवाद पर फैसला किया:

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द हिंदू: 17 जनवरी 2026 को प्रकाशित:

 

समाचार में क्यों? (Why in News?)

नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था राजशाही के अंत और संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना के बाद से अब तक के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक के दौर से गुजर रही है। नेपाल के निर्वाचन आयोग द्वारा गगन थापा के नेतृत्व वाले गुट को वैध नेपाली कांग्रेस के रूप में मान्यता देना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह देश के राजनीतिक विकास में एक निर्णायक मोड़ को दर्शाता है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब नेपाल राजनीतिक अस्थिरता, जनता के आक्रोश, युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों और पारंपरिक राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता के गहरे संकट से जूझ रहा है। इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव निर्वाचन लोकतंत्र, दलगत राजनीति, पीढ़ीगत नेतृत्व परिवर्तन और नेपाल के समग्र शासन ढांचे पर पड़ने वाले हैं।

 

पृष्ठभूमि: राजनीतिक अस्थिरता और जेन-ज़ी (Gen Z) आंदोलन:

नेपाल की वर्तमान राजनीतिक उथल-पुथल को सितंबर 2025 के जेन-ज़ी विरोध प्रदर्शनों के बिना समझा नहीं जा सकता। इन आंदोलनों ने देश की राजनीति की दिशा ही बदल दी।

ये प्रदर्शन व्यापक भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, खराब शासन और राजनीतिक अभिजात वर्ग के वर्चस्व के विरुद्ध जनआक्रोश का परिणाम थे। ये विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिनमें 76 लोगों की मृत्यु हुई। यह आंदोलन किसी एक सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ युवा पीढ़ी के असंतोष का प्रतीक था।

इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप-

निर्वाचित सरकार गिर गई

संसद भंग कर दी गई

पूर्व मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी

5 मार्च 2026 को नए चुनावों की घोषणा की गई

इन घटनाओं ने नेपाली कांग्रेस (NC) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (UML) जैसे पारंपरिक दलों को गहरा झटका दिया, जिन्हें जनता से कटे हुए दल माना जाने लगा।

 

नेपाली कांग्रेस का संकट: आंतरिक असंतोष से खुले विभाजन तक:

नेपाली कांग्रेस, जो 1950 से लोकतांत्रिक आंदोलन की धुरी रही है, इस राजनीतिक संकट के केंद्र में आ गई। विशेष रूप से शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व के प्रति असंतोष जेन-ज़ी आंदोलन के बाद और तीव्र हो गया।

पांच बार प्रधानमंत्री और दो बार पार्टी अध्यक्ष रह चुके देउबा पुराने राजनीतिक ढांचे के प्रतीक बन गए। उन पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने:

निर्णयों का केंद्रीकरण किया

पार्टी में सुधार नहीं किए

युवाओं की आकांक्षाओं की अनदेखी की

चुनावी प्रदर्शन कमजोर किया

जनता का विश्वास खो दिया

इसके विपरीत, युवा नेता गगन थापा सुधारवादी चेहरे के रूप में उभरे। युवा कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के समर्थन से उन्होंने मांग की:

आंतरिक लोकतंत्र की बहाली

नेतृत्व परिवर्तन

पार्टी की दिशा तय करने के लिए विशेष महाधिवेशन

जब पार्टी नेतृत्व ने इन मांगों को ठुकरा दिया, तो जनवरी 2026 में सुधारवादी गुट ने विशेष अधिवेशन आयोजित किया। उनका दावा था कि यह पार्टी संविधान के अनुरूप था क्योंकि 40% से अधिक प्रतिनिधियों ने इसकी मांग की थी।

इस कदम से विभाजन और गहरा गया।

देउबा गुट ने इसे अवैध बताते हुए थापा को निष्कासित कर दिया, जबकि सुधारवादी गुट ने थापा को वैध अध्यक्ष घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप नेपाली कांग्रेस दो प्रतिद्वंद्वी धड़ों में बंट गई।

 

निर्वाचन आयोग की दुविधा:

यह आंतरिक संघर्ष शीघ्र ही संवैधानिक संकट बन गया क्योंकि देश में चुनाव निकट थे। चुनाव कानून के अनुसार:

केवल वैध पार्टी ही चुनाव चिह्न का उपयोग कर सकती है

उम्मीदवार उतार सकती है

राज्य की चुनावी सुविधाएँ प्राप्त कर सकती है

दोनों गुटों के दावे के कारण निर्वाचन आयोग को हस्तक्षेप करना पड़ा। यह कोई सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं था क्योंकि:

चुनाव कार्यक्रम अत्यंत निकट था

गलत निर्णय से पूरी चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती थी

पार्टी विवाद से चुनाव की वैधता पर प्रश्न उठ सकता था

लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख दांव पर लगी थी

सभी संवैधानिक प्रावधानों, पार्टी नियमों, प्रतिनिधियों के समर्थन और प्रक्रियात्मक वैधता की समीक्षा के बाद निर्वाचन आयोग ने गगन थापा गुट को वैध नेपाली कांग्रेस के रूप में मान्यता दी।

 

निर्वाचन आयोग के निर्णय का महत्व:

1. चुनावी निष्पक्षता की रक्षा

इस निर्णय से चुनाव समय पर और बिना कानूनी अड़चनों के संभव हो सके। यदि विवाद बना रहता, तो चुनावों की वैधता पर गंभीर संकट खड़ा हो जाता।

 

2. संस्थागत स्वतंत्रता की पुष्टि

इस फैसले ने यह सिद्ध किया कि निर्वाचन आयोग राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर संविधान और कानून के आधार पर निर्णय ले सकता है।

 

3. आंतरिक लोकतंत्र की जीत

नेपाल के आधुनिक इतिहास में पहली बार किसी दल के आंतरिक सुधार आंदोलन को कानूनी मान्यता मिली। यह व्यक्तिवादी राजनीति से नियम-आधारित राजनीति की ओर बदलाव का संकेत है।

 

राजनीतिक प्रभाव

शक्ति संतुलन में बदलाव

यह निर्णय दशकों से चली आ रही पारंपरिक नेतृत्व संस्कृति के पतन का संकेत है। अब सत्ता केवल व्यक्तिगत प्रभाव से नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही से चलेगी।

 

युवा राजनीति का उदय

यह फैसला दर्शाता है कि युवा मतदाता और नेता अब राजनीतिक दिशा तय करने लगे हैं। जेन-ज़ी आंदोलन केवल सड़क प्रदर्शन नहीं था, बल्कि राजनीतिक परिवर्तन का माध्यम था।

 

चुनावी प्रभाव

मान्यता मिलने से:

थापा गुट को पार्टी चिह्न और संगठन का लाभ मिला

देउबा गुट हाशिये पर चला गया

UML और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को कड़ी चुनौती मिली

राजनीतिक विश्वसनीयता की बहाली

एक संगठित और सुधरी हुई नेपाली कांग्रेस लोकतंत्र में जनता का विश्वास फिर से कायम कर सकती है।

 

आगे की चुनौतियाँ:

हालांकि निर्णय ऐतिहासिक है, फिर भी कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं:

पार्टी के भीतर एकता बनाए रखना

युवाओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरना

चुनावी सफलता को प्रभावी शासन में बदलना

पुराने नेतृत्व का प्रतिरोध

गठबंधन राजनीति से उत्पन्न अस्थिरता

विश्लेषक दिनेश काफ्ले के अनुसार, नेतृत्व बदलना आसान है, लेकिन वैचारिक और संरचनात्मक परिवर्तन में समय लगता है।

 

निष्कर्ष:

गगन थापा के नेतृत्व वाले नेपाली कांग्रेस को मान्यता देना केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि नेपाल की लोकतांत्रिक यात्रा में एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह निर्णय पारदर्शिता, जवाबदेही और पीढ़ीगत बदलाव की बढ़ती मांग को दर्शाता है।

यह प्रकरण दिखाता है कि जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं, तो वे राजनीतिक विकृतियों को सुधार सकती हैं और जनता का विश्वास बहाल कर सकती हैं। अब यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नया नेतृत्व वास्तव में सुधार लागू करता है या यह बदलाव केवल अस्थायी सिद्ध होता है।

संक्षेप में, नेपाल आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे पुरानी राजनीति दोहरानी है या लोकतांत्रिक नवीकरण को अपनाना है — और फिलहाल संकेत परिवर्तन की ओर हैं।

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