भारत में विनिर्माण क्यों पिछड़ गया

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स्रोत: द हिन्दू, 25 दिसंबर 2025

 

समाचार में क्यों?

सुब्रमण्यम का विश्लेषण Make in India 2.0, संरचनात्मक सुधार और बजट 2025–26 पर बहस के बीच प्रासंगिक हो गया है। इस अध्ययन में डच डिजीज, कम तकनीकी उन्नयन, श्रम-उत्पादकता अंतर और चीन+1 जैसी वैश्विक अवसरों के लिए भारत की तैयारी की आवश्यकता जैसी चुनौतियों को उजागर किया गया है।

भारत ने 20वीं सदी की शुरुआत में चीन और दक्षिण कोरिया के समान उत्पादन क्षमता के साथ शुरुआत की थी, फिर भी यह सेक्टर कभी विकास इंजन नहीं बन सका। जबकि चीन और दक्षिण कोरिया ने मैन्युफैक्चरिंग-आधारित GDP वृद्धि बनाई, भारत का हिस्सा लगभग 15–17% पर स्थिर रहा, और सेवाओं ने योगदान में इसे पीछे छोड़ दिया। अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यम की पुस्तक A Sixth of Humanity इस कमज़ोरी के संरचनात्मक और नीतिगत कारणों की पड़ताल करती है।

 

प्रदर्शन की मुख्य झलकियाँ

  • औद्योगिक वृद्धि: इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) जुलाई 2025 में 3.5% YoY बढ़ा; मैन्युफैक्चरिंग 5.4% बढ़ी।
  • निर्यात: अप्रैल–अगस्त 2025 में मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स US$184.13 बिलियन तक पहुँची, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल और टेक्सटाइल्स से प्रेरित।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स: मोबाइल निर्माण 2014–15 में 2 यूनिट से बढ़कर 2024–25 में 300 यूनिट; एक्सपोर्ट्स 127 गुना बढ़ी। भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता है।
  • फार्मास्यूटिकल्स: वैश्विक टीकों का 50% से अधिक आपूर्ति करता है; 2047 तक अनुमानित बाजार: US$450 बिलियन।
  • ऑटोमोबाइल्स: भारत चौथा सबसे बड़ा वैश्विक निर्माता; GDP में 7.1% और मैन्युफैक्चरिंग GDP में 49% योगदान।
  • टेक्सटाइल्स: 45 मिलियन लोगों को रोजगार देता है; 2030 तक US$350 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान, 3.5 करोड़ नौकरियाँ सृजित करेगा।

 

नीतिगत हस्तक्षेप

  • PLI योजना: 14 प्रमुख सेक्टरों में ₹1.97 लाख करोड़ का निवेश, वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए।
  • राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (NMM): नीति, शासन और सततता को जोड़ते हुए मिशन मोड फ़्रेमवर्क; क्लीन-टेक मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान केंद्रित।
  • PM MITRA पार्क: सात मेगा टेक्सटाइल पार्क, ₹4,445 करोड़ निवेश से ₹70,000 करोड़ निवेश आकर्षित करने और 20 लाख नौकरियाँ सृजित करने की योजना।
  • कौशल विकास: ₹8,800 करोड़ स्किल इंडिया के तहत, PM Kaushal Vikas Yojana 4.0, National Apprenticeship Promotion Scheme और Jan Shikshan Sansthan को एकीकृत।
  • GST 2.0: सरल दरें लागत और अनुपालन कम करती हैं; MSMEs और निर्यात-उन्मुख उद्योगों को लाभ।
  • वैश्विक एकीकरण: 2014–25 में FDI निवेश USD 748.78 बिलियन; वार्षिक लक्ष्य USD 100 बिलियन।

 

मुख्य चुनौतियाँ

डच डिजीज और उच्च सार्वजनिक क्षेत्र वेतन

उच्च सरकारी वेतन ने कुशल श्रम को मैन्युफैक्चरिंग से खींच लिया, जिससे उत्पादक श्रमिकों की कमी हुई। घरेलू मजदूरी बढ़ने से उत्पाद की लागत बढ़ी, जबकि फ्री ट्रेड के तहत सस्ते आयात ने स्थानीय उद्योगों को नुकसान पहुँचाया। नतीजतन, भारत का मैन्युफैक्चरिंग GDP हिस्सा कम रहा, जबकि चीन और दक्षिण कोरिया में मैन्युफैक्चरिंग रोजगार, निर्यात और आर्थिक वृद्धि का इंजन बनी।

 

तकनीकी उन्नयन की समस्याएँ

संभावित प्रोत्साहनों के बावजूद भारत पूंजी-गहन ऑटोमेशन अपनाने में विफल रहा:

  • निजी क्षेत्र का विकास सॉफ्टवेयर और श्रम-गहन यूनिकॉर्न पर केंद्रित, जिससे ऑटोमेशन सीमित।
  • सस्ता श्रम उत्पादकता-उन्मुख निवेश को कम करता रहा।
  • असमान वेतन वृद्धि और आधुनिक तकनीक की धीमी अपनाने से बड़े पैमाने पर दक्षता लाभ नहीं मिला।

 

चीन और दक्षिण कोरिया के साथ तुलना
भारत में मैन्युफैक्चरिंग GDP का लगभग 15% योगदान करती है और लगभग 12% कार्यबल को रोजगार देती है, जबकि चीन और दक्षिण कोरिया में मैन्युफैक्चरिंग GDP का 28–32% और रोजगार का 25–30% योगदान। भारत में निर्यात वृद्धि चीन और दक्षिण कोरिया की तेज़ी के मुकाबले सुस्त रही।

 

आगे का रास्ता

  • सार्वजनिक क्षेत्र सुधार: वेतन को उत्पादकता के अनुसार संरेखित करें, पॉपुलिज़्म नहीं, ताकि डच डिजीज का प्रभाव कम हो।
  • तकनीकी प्रोत्साहन: PLI स्कीम, स्किल इंडिया को मजबूत करें और पूंजी-गहन, उच्च उत्पादकता वाले मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दें।
  • मैन्युफैक्चरिंग रोजगार पर ध्यान: सेवाओं का GDP में योगदान 55% से अधिक है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग 10 करोड़ से अधिक रोजगार सृजित करने में महत्वपूर्ण।
  • निर्यात-उन्मुख रणनीति: आयात प्रतिस्थापन से वैश्विक प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग की ओर बदलाव; चीन+1 जैसे अवसरों का लाभ उठाएँ।
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