स्रोत: द हिन्दू, 25 दिसंबर 2025
समाचार में क्यों?
सुब्रमण्यम का विश्लेषण Make in India 2.0, संरचनात्मक सुधार और बजट 2025–26 पर बहस के बीच प्रासंगिक हो गया है। इस अध्ययन में डच डिजीज, कम तकनीकी उन्नयन, श्रम-उत्पादकता अंतर और चीन+1 जैसी वैश्विक अवसरों के लिए भारत की तैयारी की आवश्यकता जैसी चुनौतियों को उजागर किया गया है।
भारत ने 20वीं सदी की शुरुआत में चीन और दक्षिण कोरिया के समान उत्पादन क्षमता के साथ शुरुआत की थी, फिर भी यह सेक्टर कभी विकास इंजन नहीं बन सका। जबकि चीन और दक्षिण कोरिया ने मैन्युफैक्चरिंग-आधारित GDP वृद्धि बनाई, भारत का हिस्सा लगभग 15–17% पर स्थिर रहा, और सेवाओं ने योगदान में इसे पीछे छोड़ दिया। अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यम की पुस्तक A Sixth of Humanity इस कमज़ोरी के संरचनात्मक और नीतिगत कारणों की पड़ताल करती है।
प्रदर्शन की मुख्य झलकियाँ
नीतिगत हस्तक्षेप
मुख्य चुनौतियाँ
डच डिजीज और उच्च सार्वजनिक क्षेत्र वेतन
उच्च सरकारी वेतन ने कुशल श्रम को मैन्युफैक्चरिंग से खींच लिया, जिससे उत्पादक श्रमिकों की कमी हुई। घरेलू मजदूरी बढ़ने से उत्पाद की लागत बढ़ी, जबकि फ्री ट्रेड के तहत सस्ते आयात ने स्थानीय उद्योगों को नुकसान पहुँचाया। नतीजतन, भारत का मैन्युफैक्चरिंग GDP हिस्सा कम रहा, जबकि चीन और दक्षिण कोरिया में मैन्युफैक्चरिंग रोजगार, निर्यात और आर्थिक वृद्धि का इंजन बनी।
तकनीकी उन्नयन की समस्याएँ
संभावित प्रोत्साहनों के बावजूद भारत पूंजी-गहन ऑटोमेशन अपनाने में विफल रहा:
चीन और दक्षिण कोरिया के साथ तुलना
भारत में मैन्युफैक्चरिंग GDP का लगभग 15% योगदान करती है और लगभग 12% कार्यबल को रोजगार देती है, जबकि चीन और दक्षिण कोरिया में मैन्युफैक्चरिंग GDP का 28–32% और रोजगार का 25–30% योगदान। भारत में निर्यात वृद्धि चीन और दक्षिण कोरिया की तेज़ी के मुकाबले सुस्त रही।
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