द हिंदू: 19 जून 2025 को प्रकाशित:
समाचार में क्यों?
ईरान और इज़रायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ी आई है। इससे भारत सहित पूरी दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।
अब तक क्या हुआ है?
13 जून को ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स की कीमतों में लगभग 9% की वृद्धि हुई और यह $75.65 प्रति बैरल तक पहुँच गई।
इसने $78.50 प्रति बैरल का इंट्राडे उच्चतम स्तर भी छुआ (5 महीने का उच्चतम स्तर)।
17 जून रात 8 बजे तक कीमत $74.98 थी, जो सोमवार की तुलना में 2.4% अधिक है।
तेल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
ईरान ने कई बार हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद करने की धमकी दी है।
यह एक रणनीतिक चोकपॉइंट है जिससे दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कच्चा तेल समुद्री मार्ग से भेजा जाता है।
यदि यह बंद होता है, तो:
तेल आपूर्ति में देरी होगी
शिपिंग व बीमा लागत बढ़ेगी
अंततः ऊर्जा की कीमतें बढ़ेंगी
यह स्थिति सुएज़ नहर और लाल सागर के जरिये भारतीय व्यापार को भी प्रभावित कर सकती है।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य का महत्व:
यह पर्सियन गल्फ को अरब सागर से जोड़ता है।
2024 में, इसके जरिए प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल (20% वैश्विक उपभोग) और 83% KNG एशियाई देशों को भेजा गया।
यदि यह बाधित हुआ, तो भारत जैसे आयातक देशों को सीधा प्रभाव होगा।
क्या दुनिया इससे निपट सकती है?
IEA की जून रिपोर्ट के अनुसार:
वर्ष 2025 में तेल की आपूर्ति माँग से अधिक रहने की संभावना है
माँग में 7.2 लाख बैरल/दिन और आपूर्ति में 1.8 मिलियन बैरल/दिन की वृद्धि अनुमानित
फरवरी से वैश्विक तेल भंडार में वृद्धि हो रही है (मई में 9.3 करोड़ बैरल)
परंतु, IEA ने आगाह किया कि भू-राजनीतिक जोखिम अब भी अधिक हैं।
JM Financial का मानना है कि ईरान द्वारा हॉर्मुज़ को बाधित करने की संभावना कम है, पर यदि हुआ तो तेल की कीमतें और महंगाई बहुत बढ़ सकती है।
भारत की स्थिति कैसी है?
भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरतों का 80% से अधिक आयात करता है।
भारत वर्तमान में ईरान से सीधा तेल आयात नहीं करता (अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण)।
तेल आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाई गई है (Petroleum Minister हरदीप पुरी के अनुसार)।
लेकिन वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी से भारत पर आर्थिक असर जरूर पड़ेगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:
ICRA की चीफ इकनॉमिस्ट अदिति नायर के अनुसार:
अभी की कीमतें "कम आधार" से बढ़ी हैं, इसलिए फिलहाल GDP अनुमान 6.2% पर बना रहेगा।
लेकिन यदि कीमतें ज्यादा समय तक ऊँची रहीं:
कंपनियों की लाभप्रदता घटेगी
निजी निवेश (CapEx) में देरी होगी
GDP में गिरावट की संभावना बढ़ सकती है
शिपिंग मार्ग प्रभावित होने से भारत के निर्यात पर भी असर होगा।
निष्कर्ष:
ईरान-इज़रायल संघर्ष से ऊर्जा आपूर्ति की वैश्विक सुरक्षा पर खतरा उत्पन्न हुआ है, विशेषकर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर। भारत ने तेल आयात के स्रोतों में विविधता जरूर लाई है, लेकिन वैश्विक स्तर पर कीमतों की बढ़ोतरी और अस्थिरता से भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
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