मलयालम भाषा विधेयक, 2025 क्या है?

मलयालम भाषा विधेयक, 2025 क्या है?

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द हिंदू: 15 जनवरी 2026 को प्रकाशित:

 

क्यों चर्चा में है? (Why in News)

मलयालम भाषा विधेयक, 2025 केरल और कर्नाटक के बीच उत्पन्न एक अंतर-राज्यीय संवैधानिक और भाषायी विवाद के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। यद्यपि इस विधेयक को अक्टूबर 2025 में केरल विधानसभा द्वारा पारित कर दिया गया था, लेकिन कर्नाटक सरकार ने इसका विरोध किया है। कर्नाटक का तर्क है कि विधेयक के प्रस्तावित प्रावधान केरल में रहने वाले कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों, विशेषकर कासरगोड जिले में रहने वाले लोगों के भाषायी अधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं।

इस विवाद ने इस मुद्दे को केवल राज्य स्तरीय कानून तक सीमित न रखते हुए भाषायी अल्पसंख्यकों के संवैधानिक संरक्षण, संघीय संबंधों, तथा राज्य और केंद्र के बीच विधायी अधिकारों के विभाजन से जुड़े व्यापक प्रश्नों से जोड़ दिया है। वर्तमान में यह विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति की प्रतीक्षा में है।

 

पृष्ठभूमि और संदर्भ (Background and Context):

केरल ने ऐतिहासिक रूप से मलयालम भाषा को सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में बढ़ावा दिया है, हालांकि प्रशासनिक और न्यायिक सुविधा के लिए अंग्रेज़ी भी एक आधिकारिक भाषा के रूप में प्रचलित रही है। समय के साथ, राज्य ने शासन, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में मलयालम के अधिक व्यापक संस्थानीकरण का प्रयास किया है।

इससे पहले, वर्ष 2015 में मलयालम भाषा (प्रसार और समृद्धि) विधेयक, 2015 पेश किया गया था। यद्यपि यह विधेयक केरल विधानसभा द्वारा पारित कर दिया गया था, लेकिन इसे राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति रोक दी गई, क्योंकि यह निम्नलिखित से टकराव में था:

आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1963

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत त्रिभाषा सूत्र

संविधान में निहित भाषायी अल्पसंख्यकों के संरक्षण

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधान

इन्हीं अनुभवों से सीख लेते हुए, केरल सरकार ने मलयालम भाषा विधेयक, 2025 प्रस्तुत किया है और दावा किया है कि इसमें पूर्ववर्ती संवैधानिक त्रुटियों को दूर कर दिया गया है तथा मलयालम की कार्यात्मक भूमिका को और सशक्त किया गया है।

 

मलयालम भाषा विधेयक, 2025 में क्या प्रावधान हैं?:

यह विधेयक संविधान के प्रावधानों के अधीन रहते हुए मलयालम को केरल की एकमात्र आधिकारिक भाषा घोषित करने का प्रस्ताव करता है। इसका दायरा सार्वजनिक जीवन के कई क्षेत्रों तक फैला हुआ है।

शासन के क्षेत्र में, यह विधेयक सरकारी प्रशासन, सार्वजनिक संचार, व्यापार तथा डिजिटल मंचों पर मलयालम के उपयोग को अनिवार्य बनाता है। सभी विधेयक और अध्यादेश मलयालम में ही प्रस्तुत किए जाएंगे, जिससे विधायी कार्यों में इसकी प्राथमिकता स्थापित होगी।

शिक्षा क्षेत्र में, सबसे विवादास्पद प्रावधान यह है कि कक्षा 10 तक सभी सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों में मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा बनाया जाएगा। इसका उद्देश्य प्रारंभिक भाषायी समावेशन और सांस्कृतिक निरंतरता सुनिश्चित करना है।

न्यायपालिका के संदर्भ में, यह विधेयक निर्णयों और न्यायालयीन कार्यवाहियों के चरणबद्ध रूप से मलयालम में अनुवाद की परिकल्पना करता है, जिससे आम जनता के लिए न्यायिक प्रक्रिया अधिक सुलभ हो सके।

संस्थागत स्तर पर, विधेयक कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार (आधिकारिक भाषा) विभाग का नाम बदलकर मलयालम भाषा विकास विभाग करने तथा इसके अंतर्गत एक मलयालम भाषा विकास निदेशालय की स्थापना का प्रस्ताव करता है। इसके अतिरिक्त, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को ओपन-सोर्स मलयालम सॉफ़्टवेयर विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, जिससे भाषा को डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में एकीकृत किया जा सके।

 

क्या यह विधेयक सभी विद्यालयों में मलयालम को अनिवार्य बनाता है?:

यह विधेयक सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों में मलयालम को प्रथम भाषा के रूप में अनिवार्य करता है, लेकिन यह अन्य भाषाओं को पाठ्यक्रम से स्वतः समाप्त नहीं करता। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि मलयालम को प्रथम भाषा बनाना अप्रत्यक्ष रूप से भाषायी अल्पसंख्यकों को हाशिये पर धकेल सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ गैर-मलयालम भाषी आबादी अधिक है।

निजी गैर-सहायता प्राप्त विद्यालय इस कठोरता के दायरे में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं हैं, लेकिन यह चिंता बनी हुई है कि एकसमान क्रियान्वयन से व्यवहार में भाषायी विविधता प्रभावित हो सकती है।

 

कर्नाटक ने विधेयक का विरोध क्यों किया है?

कर्नाटक का विरोध मुख्यतः भाषायी अल्पसंख्यकों के अधिकारों के क्षरण की आशंका पर आधारित है, विशेषकर केरल के कासरगोड जिले में रहने वाले कन्नड़ भाषी समुदायों को लेकर।

वर्तमान में, इन क्षेत्रों के छात्र प्रायः कन्नड़ को प्रथम भाषा के रूप में पढ़ते हैं और वहाँ कन्नड़ माध्यम के विद्यालय भी संचालित हैं। कर्नाटक सरकार को आशंका है कि मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा बनाने से:

मौजूदा शैक्षणिक व्यवस्था बाधित होगी

कन्नड़ माध्यम विद्यालयों की संख्या में और गिरावट आएगी (जो पहले ही 197 से घटकर 192 रह गई है)

सीमा क्षेत्रों में कन्नड़ भाषा की सांस्कृतिक उपस्थिति कमजोर होगी

कर्नाटक सरकार ने इस विधेयक को “असंवैधानिक” बताते हुए कहा है कि यह संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 का उल्लंघन करता है, जो अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करते हैं। कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण के एक प्रतिनिधिमंडल ने औपचारिक रूप से केरल के राज्यपाल से इस विधेयक को अस्वीकार करने या इसमें संशोधन कराने का अनुरोध किया है।

 

केरल सरकार का पक्ष और संवैधानिक औचित्य:

केरल सरकार ने विधेयक का सशक्त रूप से बचाव करते हुए कहा है कि यह संवैधानिक रूप से वैध है और अल्पसंख्यक अधिकारों के प्रति संवेदनशील है।

कानून मंत्री पी. राजीव ने स्पष्ट किया कि विधेयक में तमिल, कन्नड़, तुलु और कोंकणी जैसी भाषायी अल्पसंख्यक भाषाओं के लिए स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान शामिल हैं। इन समुदायों को:

सरकारी कार्यालयों के साथ पत्राचार में अपनी मातृभाषा का उपयोग करने

अल्पसंख्यक-बहुल क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासनिक निकायों से अपनी भाषा में संवाद करने

की अनुमति दी जाएगी।

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने धारा 7 (नॉन-ऑब्सटैंटे क्लॉज) का उल्लेख किया, जो अन्य प्रावधानों पर वरीयता रखते हुए अल्पसंख्यक संरक्षण सुनिश्चित करती है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक:

संविधान के अनुच्छेद 346 और 347

आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1963

के अनुरूप है। केरल सरकार के अनुसार, यह विधेयक भाषायी बहुलता को दबाए बिना मलयालम को बढ़ावा देता है।

 

कर्नाटक की निरंतर प्रतिक्रिया और राजनीतिक तीव्रता:

केरल सरकार की सफाइयों के बावजूद, कर्नाटक ने अपना विरोध जारी रखा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा है कि यदि विधेयक को वापस नहीं लिया गया या संशोधित नहीं किया गया, तो कर्नाटक उपलब्ध सभी संवैधानिक उपायों का उपयोग करेगा। राज्य सरकार ने इस मामले को भारत के राष्ट्रपति तक ले जाने की भी इच्छा जताई है।

कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने मांग की है कि कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के लिए स्पष्ट और क्षेत्र-विशिष्ट छूट प्रदान की जाए, क्योंकि सामान्य सुरक्षा प्रावधानों को वह अपर्याप्त मानता है।

 

संबंधित संवैधानिक और संघीय मुद्दे:

यह विवाद संघीय व्यवस्था में एक पारंपरिक तनाव को उजागर करता है:

एक ओर, किसी राज्य का अपनी आधिकारिक भाषा को बढ़ावा देने का अधिकार

दूसरी ओर, संविधान द्वारा भाषायी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का दायित्व

शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, किंतु केंद्रीय कानूनों और संवैधानिक सिद्धांतों के अधीन। इस विधेयक का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे मलयालम का युक्तिसंगत संवर्धन माना जाता है या अल्पसंख्यक अधिकारों पर अप्रत्यक्ष अतिक्रमण।

राज्यपाल का निर्णय—स्वीकृति देना, स्पष्टीकरण माँगना या राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजना—अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

 

व्यापक महत्व और आगे की राह:

मलयालम भाषा विधेयक, 2025 केवल एक भाषा नीति नहीं है, बल्कि यह भारत में पहचान, समावेशन और सहकारी संघवाद पर चल रही व्यापक बहस को दर्शाता है। क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण सांस्कृतिक स्थिरता के लिए आवश्यक है, लेकिन इसे भारत की संवैधानिक भाषायी विविधता और अल्पसंख्यक संरक्षण की प्रतिबद्धता के साथ संतुलित करना भी उतना ही आवश्यक है।

लक्षित छूट, स्पष्ट क्रियान्वयन दिशानिर्देश, और अंतर-राज्यीय संवाद के माध्यम से अपनाया गया एक सहमति-आधारित दृष्टिकोण इस मुद्दे को लंबे संवैधानिक संघर्ष में बदलने से रोक सकता है।

 

निष्कर्ष (Conclusion):

मलयालम भाषा विधेयक, 2025 मलयालम की संस्थागत भूमिका को सशक्त करने के केरल के प्रयास को दर्शाता है, साथ ही यह एक भाषायी रूप से विविध राष्ट्र के शासन से जुड़े जटिल संवैधानिक प्रश्नों को भी उजागर करता है। इसका अंतिम परिणाम इस बात की परीक्षा होगा कि भारत किस प्रकार क्षेत्रीय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और बहुलतावाद—जो उसकी संवैधानिक लोकतंत्र की मूल भावना है—के बीच संतुलन स्थापित करता है।

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