The Hindu: 26 फरवरी 2026 को प्रकाशित
यह चर्चा में क्यों है
US Department of Commerce द्वारा कुछ भारतीय सौर उत्पादों पर 126% का प्रारंभिक काउंटरवेलिंग ड्यूटी (CVD) लगाए जाने के निर्णय ने भारत के नवीकरणीय ऊर्जा और निर्यात क्षेत्र में गंभीर चिंता पैदा कर दी है। यह कदम Adani Group की दो सहायक कंपनियों; मुंद्रा सोलर एनर्जी और मुंद्रा सोलर पीवी; के चल रही एंटी-सब्सिडी जांच से हटने के बाद उठाया गया। यह विकास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब भारत और अमेरिका दोनों स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और जलवायु सहयोग की सार्वजनिक रूप से वकालत कर रहे हैं।

जांच की पृष्ठभूमि
काउंटरवेलिंग ड्यूटी (CVD) की जांच की शुरुआत अमेरिकी सौर निर्माताओं के संगठन Alliance for American Solar Manufacturing and Trade द्वारा दायर याचिका के बाद हुई। इस संगठन ने आरोप लगाया कि भारतीय उत्पादकों को भारत सरकार द्वारा दी जा रही अनुचित सब्सिडियों का लाभ मिल रहा है, जिससे अमेरिकी घरेलू उद्योग को नुकसान हो रहा है।
यह जांच औपचारिक रूप से अगस्त 2025 में शुरू हुई। अमेरिकी व्यापार कानून के तहत, जब सब्सिडी प्राप्त आयात के आरोप सामने आते हैं, तो US Department of Commerce निम्नलिखित बिंदुओं की जांच करता है:
मुंद्रा सोलर एनर्जी और मुंद्रा सोलर पीवी को “अनिवार्य प्रत्युत्तरदाता” के रूप में चिन्हित किया गया था, अर्थात् सब्सिडी मार्जिन की गणना के लिए उनके डेटा और जवाब अत्यंत महत्वपूर्ण थे। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार कंपनियों ने पूर्ण जानकारी उपलब्ध नहीं कराई और बाद में कार्यवाही से हट गईं।
इसके परिणामस्वरूप, वाणिज्य विभाग ने “Adverse Facts Available (AFA)” सिद्धांत लागू किया। यह एक सख्त प्रावधान है, जिसका उपयोग तब किया जाता है जब कंपनियां जांच में सहयोग नहीं करतीं। AFA के तहत अधिकारी उपलब्ध सर्वोत्तम तथ्यों के आधार पर निर्णय लेते हैं, जिससे अक्सर अत्यधिक ऊंची शुल्क दर निर्धारित होती है। इसी के चलते लगभग 125.9–126% का प्रारंभिक भारी शुल्क लगाया गया।
काउंटरवेलिंग ड्यूटी (CVD) क्या है?
काउंटरवेलिंग ड्यूटी वह शुल्क है जो किसी विदेशी सरकार द्वारा अपने निर्यातकों को दी गई सब्सिडी के प्रभाव को संतुलित करने के लिए लगाया जाता है। इसका उद्देश्य निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना और कृत्रिम रूप से कम कीमत वाले आयात से घरेलू उद्योग को होने वाले नुकसान को रोकना है।
इस मामले में अमेरिकी अधिकारियों ने भारत की कई निर्यात-आधारित योजनाओं की जांच की, जिनमें शामिल हैं:
जांच में पाया गया कि ये योजनाएं निर्यात प्रदर्शन से जुड़ी हुई हैं। World Trade Organization (WTO) के नियमों और अमेरिकी व्यापार कानून के अनुसार, निर्यात-आधारित सब्सिडियां चुनौती के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील मानी जाती हैं।
अंतरराष्ट्रीय (Transnational) सब्सिडी और चीनी इनपुट पर ध्यान
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू “ट्रांसनेशनल सब्सिडी” का आरोप है। वाणिज्य विभाग ने यह भी जांच की कि क्या प्रमुख कच्चे माल और मध्यवर्ती उत्पाद सीमापार (cross-border) स्तर पर बाज़ार दर से कम कीमत पर प्राप्त किए गए।
रिपोर्ट में कहा गया कि भारत का सौर विनिर्माण तंत्र चीन से आयात पर अत्यधिक निर्भर है। निम्नलिखित महत्वपूर्ण इनपुट अक्सर चीनी आपूर्तिकर्ताओं से प्राप्त किए जाते हैं:
अमेरिकी अधिकारियों ने चिंता व्यक्त की कि भारत में चीनी निवेश का पैटर्न कंबोडिया, मलेशिया, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में देखी गई प्रवृत्तियों से मेल खाता है। इन देशों को पहले भी सौर उत्पादों से संबंधित अमेरिकी व्यापार जांच का सामना करना पड़ा है।
यह व्यापक अमेरिकी रणनीति को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य चीन-प्रभुत्व वाली स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता कम करना और तीसरे देशों के माध्यम से चीनी मूल के लाभों के अप्रत्यक्ष मार्ग को रोकना है।
भारतीय सौर उद्योग पर प्रभाव
भारत के सौर विनिर्माण क्षेत्र के लिए इसके प्रभाव काफी व्यापक और गंभीर हो सकते हैं।

1. निर्यात में बाधा
126% का भारी शुल्क भारतीय मॉड्यूल को अमेरिकी बाजार में काफी महंगा बना देगा। इससे वे अमेरिकी घरेलू उत्पादकों या अन्य देशों के आपूर्तिकर्ताओं की तुलना में प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं। परिणामस्वरूप, भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में टिके रहना कठिन हो सकता है।
2. घरेलू बाजार पर दबाव
यदि अमेरिकी निर्यात में तेज गिरावट आती है, तो भारतीय निर्माता अपनी आपूर्ति को घरेलू बाजार की ओर मोड़ सकते हैं। इससे:
विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा हुआ तो विशेषकर मध्यम आकार की कंपनियों की वित्तीय स्थिति (balance sheet) पर गंभीर असर पड़ सकता है।
3. निवेश अनिश्चितता
यह मामला भारत में सौर विनिर्माण क्षमता के विस्तार के लिए नए निवेश को प्रभावित कर सकता है, खासकर वे परियोजनाएं जो मुख्य रूप से निर्यात बाजार पर केंद्रित हैं। बदलती व्यापार नीतियों और बढ़ती संरक्षणवादी प्रवृत्तियों को देखते हुए निवेशक जोखिम का पुनर्मूल्यांकन कर सकते हैं। इससे दीर्घकालिक क्षमता विस्तार की योजनाओं पर असर पड़ सकता है।
भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों पर प्रभाव
हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक सहयोग में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, विशेषकर रक्षा, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा परिवर्तन के क्षेत्रों में। स्वच्छ ऊर्जा सहयोग द्विपक्षीय संबंधों का एक प्रमुख स्तंभ रहा है। हालांकि, यह विवाद कुछ अंतर्निहित तनावों को उजागर करता है:
यह शुल्क कार्रवाई व्यापार कूटनीति को जटिल बना सकती है, विशेषकर यदि भारत इस निर्णय को World Trade Organization (WTO) में चुनौती देने या द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से समाधान तलाशने का निर्णय लेता है।
कानूनी और प्रक्रियात्मक पहलू
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 126% का शुल्क अभी प्रारंभिक (preliminary) निर्णय है। जांच प्रक्रिया आमतौर पर निम्न चरणों में पूरी होती है:
यदि अंतिम निर्णय में इन शुल्कों की पुष्टि हो जाती है, तो वे कई वर्षों तक लागू रह सकते हैं, जब तक कि उनकी समीक्षा न हो या उन्हें कानूनी चुनौती देकर निरस्त न किया जाए।
व्यापक वैश्विक संदर्भ
सौर उद्योग पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर कई व्यापार विवादों के केंद्र में रहा है। प्रमुख प्रवृत्तियां निम्नलिखित हैं:
विडंबना यह है कि जहां जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा के तीव्र विस्तार की आवश्यकता है, वहीं व्यापारिक अवरोध लागत बढ़ाकर इसके प्रसार को धीमा कर सकते हैं। पर्यावरणीय लक्ष्यों और व्यापार संरक्षणवाद के बीच यह तनाव अभी तक सुलझ नहीं पाया है।
भारत के लिए रणनीतिक प्रश्न
यह प्रकरण भारत के समक्ष कई महत्वपूर्ण नीतिगत प्रश्न खड़े करता है:
ये प्रश्न भारत की उस महत्वाकांक्षा के केंद्र में हैं, जिसके तहत वह स्वयं को एक वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है।
निष्कर्ष
US Department of Commerce द्वारा लगाया गया 126% का प्रारंभिक शुल्क भारत–अमेरिका सौर व्यापार संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ का प्रतिनिधित्व करता है। यह निर्णय Adani Group की सहायक कंपनियों के जांच प्रक्रिया से हटने के बाद आया और यह अमेरिकी व्यापार कानूनों के सख्त प्रवर्तन तथा सब्सिडी-आधारित निर्यात को लेकर चिंताओं को दर्शाता है।
तात्कालिक व्यावसायिक प्रभावों से परे, यह मामला गहरे संरचनात्मक मुद्दों को भी उजागर करता है:
अंतिम निर्णय शुल्क को बरकरार रखे या उसमें संशोधन करे, यह प्रकरण स्पष्ट करता है कि नवीकरणीय ऊर्जा; जिसे कभी केवल जलवायु परिवर्तन से जुड़ा मुद्दा माना जाता था; अब भू-राजनीतिक और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का भी महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है।
भारत के लिए आगे की राह में निर्यात रणनीतियों का पुनर्संतुलन, घरेलू मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करना और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे प्रमुख साझेदारों के साथ जटिल व्यापार कूटनीति को सावधानीपूर्वक संभालना शामिल होगा।