बिहार में अति पिछड़ी जातियों की राजनीति?

बिहार में अति पिछड़ी जातियों की राजनीति?

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द हिंदू: 29 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित।

 

समाचार में क्यों?

बिहार में 2025 विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र, अति पिछड़े वर्गों (EBCs) की राजनीतिक उपेक्षा फिर से चर्चा में है।

हालाँकि इनकी जनसंख्या 36% है, लेकिन बिहार विधानसभा में इनका प्रतिनिधित्व 10% से अधिक कभी नहीं हुआ।

 

पृष्ठभूमि:

बिहार में कुल 112 अति पिछड़ी जातियाँ हैं (2022 की जाति गणना के अनुसार)।

इन्हें ‘अनुसूची-I (Annexure-I)’ में रखा गया है, जबकि ‘अनुसूची-II’ में ऊपरी पिछड़ी जातियाँ जैसे यादव, कुर्मी, कोयरी, बनिया आती हैं।

स्वतंत्रता के बाद बिहार की राजनीति पहले सवर्ण जातियों और बाद में ऊपरी पिछड़ों (Yadav, Kurmi) द्वारा संचालित रही, जिससे EBCs हाशिए पर रह गए।

 

ऐतिहासिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य:

पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने “पिछड़ा राज” की नींव रखी।

उन्होंने मुंगरीलाल आयोग (1976) की सिफारिशों को लागू कर पिछड़ों को आरक्षण दिया।

1978 में पंचायत चुनाव कराकर स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र का विस्तार किया।

नीतीश कुमार ने 2006 में पंचायती राज संस्थाओं में EBCs के लिए 20% और महिलाओं के लिए 50% आरक्षण देकर स्थानीय भागीदारी को मजबूत किया।

इसके बावजूद, विधानसभा में EBCs का प्रतिनिधित्व बेहद कम रहा — केवल 10% तक सीमित।

 

वर्तमान स्थिति:

EBCs की एकता में विविधता सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि अधिकांश जातियों की जनसंख्या 1% से भी कम है।

अपेक्षाकृत बड़ी EBC जातियाँ हैं — तेली, धनुक, कुम्हार (प्रजापति), नाई, कहार, मल्लाह आदि।

निशाद समुदाय (22 जातियों का गठबंधन) अब 9.8% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के माध्यम से उभर रहा है।

फिर भी, निशाद नेतृत्व BJP, JDU, कांग्रेस जैसी पार्टियों में बिखरा हुआ है।

 

प्रमुख चुनौतियाँ:

जातीय विखंडन — एकजुट राजनीतिक आवाज़ का अभाव।

प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व — रेणु देवी या अली अनवर जैसे उदाहरण केवल प्रतीक हैं, संरचनात्मक बदलाव नहीं।

आर्थिक पिछड़ापन — पंचायत स्तर पर सत्ता के बावजूद गरीबी और असुरक्षा बनी हुई है।

ऊपरी पिछड़ों का वर्चस्व — यादव, कुर्मी जैसे वर्ग अभी भी राजनीति पर हावी हैं।

 

उभरते रुझान:

JDU, RJD और VIP जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ अब अधिक EBC उम्मीदवारों को टिकट दे रही हैं।

BJP और कांग्रेस अभी भी पीछे हैं।

नामांकन में मुख्य रूप से धनुक, मल्लाह, नोनिया, तेली (हिंदू EBC) और अंसारी/मोमिन (मुस्लिम EBC) को प्राथमिकता दी जाती है।

 

प्रभाव और निहितार्थ:

36% आबादी वाला EBC वर्ग 2025 चुनावों में निर्णायक वोट बैंक बन सकता है।

यदि राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ा, तो बिहार की जाति आधारित राजनीति में नया संतुलन बन सकता है।

परंतु, केवल राजनीतिक भागीदारी नहीं — आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय भी आवश्यक हैं।

 

निष्कर्ष:

  • EBC समुदाय ने स्थानीय स्तर पर तो कुछ उपलब्धियाँ हासिल की हैं, परंतु राजनीतिक मुख्यधारा में अभी भी उपेक्षित है।
  • 2025 का चुनाव इन वर्गों के लिए राजनीतिक जागरूकता और संगठित नेतृत्व का अवसर बन सकता है, बशर्ते यह विविध समुदाय एकजुट होकर संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़े।
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