द हिंदू: 4 जून 2025 को प्रकाशित:
समाचार में क्यों है:
20 मई 2025 को ताइवानी राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने अपना एक वर्ष कार्यकाल पूरा किया। हालांकि उन्होंने सहयोग की बात कही, परंतु उनकी पार्टी DPP को विधान सभा (Legislative Yuan) में बहुमत नहीं मिल पाया, जिससे KMT (विपक्षी दल) ने कई महत्वपूर्ण विधायी कदमों को रोक दिया। इसके चलते देश में लोकतांत्रिक संकट और बड़े पैमाने पर रिकॉल (पुनर्निर्वाचन) अभियान चल रहे हैं।
पृष्ठभूमि:
राजनीतिक संरचना: ताइवान की विधान सभा में कुल 113 सीटें होती हैं, जिसमें बहुमत के लिए 57 सीटों की आवश्यकता होती है।
2024 के चुनाव परिणाम:
KMT: 52 सीटें
DPP: 51 सीटें
ताइवान पीपुल्स पार्टी (TPP): 8 सीटें (KMT के साथ गठबंधन)
निर्दलीय: 2 सीटें (KMT के विचारों से मेल खातीं)
इसका अर्थ है कि भले ही राष्ट्रपति DPP से हैं, परंतु विधान सभा का नियंत्रण KMT के पास है।
मुख्य मुद्दे:
विधायी गतिरोध:
KMT ने DPP की रक्षा और वित्तीय योजनाओं को रोका।
कानून में संशोधन करके केंद्र सरकार की बजटीय शक्तियों को सीमित कर दिया।
राष्ट्रपति से अनिवार्य प्रश्नोत्तर की मांग की गई, जो पहले वैकल्पिक था।
लोकतांत्रिक संघर्ष:
DPP ने आरोप लगाया कि KMT बिना विधायी प्रक्रियाओं के कानून ला रही है।
संसद में हाथापाई की नौबत तक आ गई।
रिकॉल अभियान:
37 KMT और 15 DPP सांसदों के खिलाफ रिकॉल याचिकाएं शुरू।
मृत मतदाताओं के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर मिलने से KMT की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह।
जून-जुलाई तक कई सांसदों की सदस्यता जा सकती है।
प्रभाव:
शासन पर प्रभाव: राष्ट्रीय रक्षा और नीति निर्माण प्रभावित।
लोकतंत्र पर असर: लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सक्रियता तो दिखती है, परंतु अस्थिरता भी उजागर होती है।
KMT की छवि: चुनावी जीत के बावजूद जनता का विश्वास खोने का खतरा।
DPP को अवसर: अगर रिकॉल सफल रहे तो बहुमत की संभावना।
अंतर्राष्ट्रीय पहलू:
चीन का संदर्भ:
KMT, चीन से संवाद का पक्षधर; DPP, एकीकरण का विरोधी।
चीन इस राजनीतिक उथल-पुथल का लाभ उठाकर ताइवान पर दबाव बढ़ा सकता है।
अमेरिका और सहयोगी देश: क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।
आगे की संभावनाएं:
परिदृश्य 1 – समझौता:
राष्ट्रपति KMT से वार्ता करें, राष्ट्रहित में सहयोग पर ज़ोर दें।
परिदृश्य 2 – टकराव:
DPP, रिकॉल याचिकाओं को समर्थन देकर बहुमत हासिल करने का प्रयास करे।
परिदृश्य 3 – लोकतांत्रिक संकट:
यदि रिकॉल असफल या विवादास्पद हुए, तो ताइवान की लोकतांत्रिक छवि को नुकसान हो सकता है।
निष्कर्ष:
ताइवान का यह राजनीतिक गतिरोध केवल शासन की समस्या नहीं है, यह लोकतंत्र की परिपक्वता की भी परीक्षा है। आने वाले महीने यह तय करेंगे कि ताइवान संवाद के रास्ते आगे बढ़ता है या टकराव के रास्ते इतिहास रचता है।
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