स्रोत: द हिंदू
चर्चा में क्यों?
हाल ही में जीनोम अनुक्रमण में हुई प्रगति में कैंसर के विकास से लेकर प्रतिरक्षा संबंधी समस्याओं, मानव स्वास्थ्य पर कायिक आनुवंशिक वैरिएंट (Somatic Genetic Variants) के प्रभाव के बारे में पता चला है, यह बीमारी का पता लगाने और उपचार रणनीति में नवाचार को बढ़ावा देने में काफी मददगार साबित हो सकता है।
कायिक आनुवंशिक वैरिएंट:
परिचय:
कायिक आनुवंशिक वैरिएंट को कायिक उत्परिवर्तन के रूप में भी जाना जाता है, इसका आशय विशेष रूप से किसी व्यक्ति के शरीर की कोशिकाओं (कायिक कोशिकाओं) के भीतर DNA अनुक्रम में परिवर्तन से है, जर्मलाइन कोशिकाएँ (शुक्राणु और अंडाणु कोशिकाओं) इसके अंतर्गत नहीं आती हैं।
कायिक आनुवंशिक उत्परिवर्तन जन्म के बाद विकास के दौरान होते हैं और माता-पिता से बच्चे में नहीं आते हैं।
कायिक उत्परिवर्तन में प्रगति:
मानव जीनोम में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं जो एक बच्चे को माता-पिता से विरासत में मिलते हैं, और ये हमारी आनुवंशिक पहचान का खाका तैयार करते हैं।
एक शुक्राणु कोशिका द्वारा अंडे की कोशिका के निषेचन के बाद परिणामी एकल कोशिका में माता-पिता दोनों के आनुवंशिक तत्त्व शामिल होते हैं।
विभिन्न विभाजनों के बाद यह प्रारंभिक कोशिका बड़े पैमाने पर बढ़ना शुरू करती है और अंततः मानव शरीर का निर्माण करने वाली अनगिनत यानी खरबों कोशिकाएँ बनाती है।
DNA प्रतिकृति की प्रक्रिया के दौरान त्रुटि-सुधार करने वाले प्रोटीन द्वारा त्रुटियों का समावेश उल्लेखनीय रूप से कम कर दिया जाता है। फिर भी कुछ न्यूनतम त्रुटि दरें कायिक आनुवंशिक उत्परिवर्तन के उद्भव में योगदान करती है।
कोशिकाएँ जीवन भर नवीनीकृत होती रहती हैं और जैसे-जैसे पुरानी कोशिकाओं को प्रतिस्थापित करती रहती हैं, त्रुटियाँ होती रहती हैं जिससे समय के साथ कायिक उत्परिवर्तन का क्रमिक संचय होता रहता है।
यही कारण है कि जैसे-जैसे लोगों की आयु बढ़ती है, शरीर के विभिन्न ऊतकों के बीच आनुवंशिक संरचना में अंतर आ जाता है।
मानव स्वास्थ्य पर दैहिक आनुवंशिक वैरिएंट का प्रभाव:
कैंसर का पनपना: दैहिक आनुवंशिक परिवर्तन कैंसर की अनियंत्रित कोशिका वृद्धि और विभाजन को बढ़ा सकते हैं जिससे ट्यूमर की बीमारी हो सकती है।
तंत्रिका संबंधी विकार: मस्तिष्क कोशिकाओं में संचित दैहिक उत्परिवर्तन तंत्रिका संबंधी स्थितियों में योगदान कर सकते हैं, जो संज्ञानात्मक(Cognitive) और प्रेरण/गतिक प्रकार्य को प्रभावित कर सकते हैं।
आयु बढ़ना/जरण और ऊतक प्रकार्य: आयु बढ़ने के साथ दैहिक उत्परिवर्तन का क्रमिक संचय ऊतक के कार्य को प्रभावित कर सकता है और आयु से संबंधित बीमारियों को बढ़ा सकता है।
प्रतिरक्षा प्रणाली की निष्क्रियता: दैहिक वैरिएंट प्रतिरक्षा कोशिका के विकास और कार्य को बाधित कर सकता है, जिससे ऑटोइम्यून विकार(autoimmune disorder) और प्रतिरक्षा की कमी(immunodeficiencies) हो सकती है।
मानव स्वास्थ्य उन्नति/वृद्धि के लिए दैहिक आनुवंशिक वैरिएंट का उपयोग:
रोग बायोमार्कर: दैहिक वैरिएंट रोगों के लिये नैदानिक (Diagnostic) और पूर्वानुमानित (Prognostic) मार्कर के रूप में काम कर सकते हैं।
विशिष्ट उत्परिवर्तन का पता लगाने से रोग का शीघ्र पता चलने और रोग की प्रगति की भविष्यवाणी करने में सहायता मिल सकती है।
परिशुद्ध चिकित्सा: किसी व्यक्ति के दैहिक उत्परिवर्तन का ज्ञान व्यक्तिगत उपचार योजनाओं में मदद कर सकता है।
किसी रोगी की विशिष्ट आनुवंशिक संरचना के अनुसार उपचार करने से परिणामों में वृद्धि हो सकती है।
जरण और दीर्घजीवन: आयु बढ़ने से जुड़े दैहिक उत्परिवर्तन का अध्ययन आयु बढ़ने की प्रक्रिया और आयु से संबंधित बीमारियों पर प्रकाश डाल डालता है, जो संभावित रूप से स्वस्थ आयु बढ़ाने में बाधक हो सकता है।
आनुवंशिक रोग का समाधान: कुछ मामलों में दैहिक उत्परिवर्तन सामान्य व्यक्ति में हानिकारक परिवर्तन लाता है, जिसे रिवर्टेंट मोज़ेसिज़्म (Revertant Mosaicism) के रूप में जाना जाता है।
उदाहरण के लिये विस्कॉट-एल्ड्रिच सिंड्रोम (Wiskott-Aldrich syndrome) के लगभग 10% मामलों में एक दुर्लभ आनुवंशिक प्रतिरक्षा क्षमता, रिवर्टेंट मोज़ेसिज्म पाई गई है, जिसके परिणामस्वरूप कई व्यक्तियों में बीमारी की गंभीरता कम हो गई है।
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