SC ने सरकार से इंटरनेट पर कंटेंट को रेगुलेट करने को कहा:

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द हिंदू: 28 नवंबर 2025 को पब्लिश हुआ।

 

चर्चा में क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) को निर्देश दिया है कि वह यूज़र-जनरेटेड कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करे। अदालत ने ऑनलाइन अभद्र, भ्रामक, मानहानिकारक या “राष्ट्र-विरोधी” सामग्री के तेज़ी से फैलने और पीड़ितों की सुरक्षा न होने पर चिंता जताई।

 

क्या हुआ है?

CJI सुर्या कांत और जस्टिस जॉयमल्य बागची की बेंच ने माना कि उपयोगकर्ता द्वारा बनाई गई सामग्री वायरल होने से पहले सोशल प्लेटफ़ॉर्म उसे हटा नहीं सकते।

कोर्ट ने एक निष्पक्ष और स्वायत्त प्राधिकरण बनाने का सुझाव दिया, जो “प्रथम दृष्टया स्वीकार्य” सामग्री का परीक्षण करे।

वयस्क सामग्री के लिए आधार आधारित आयु सत्यापन जैसे कड़े उपायों पर भी विचार हुआ।

कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनी रहेगी, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत ‘उचित प्रतिबंध’ लगाए जा सकते हैं।

 

अदालत द्वारा उठाए गए मुख्य मुद्दे:

a) जवाबदेही की कमी

कोई भी बिना किसी नियंत्रण के ऑनलाइन चैनल या पेज बना सकता है।

 

b) वायरल कंटेंट से त्वरित नुकसान

24 घंटे का टेकडाउन समय काफी लंबा है; तब तक हानिकारक सामग्री लाखों तक पहुँच जाती है।

 

c) पीड़ितों पर असर

लाखों लोग अशोभनीय या झूठी सामग्री से क्षतिग्रस्त होते हैं लेकिन उन्हें तत्काल सुरक्षा नहीं मिलती।

 

d) मौजूदा कानून अपर्याप्त

मानहानि या आपराधिक कानून केवल घटना के बाद मदद करते हैं, जो पर्याप्त नहीं है।

 

e) AI-आधारित प्लेटफ़ॉर्म

प्लेटफ़ॉर्म एआई का उपयोग करके सामग्री को क्यूरेट और मुनाफ़ा कमा रहे हैं, जिससे जोखिम बढ़ गया है।

 

कोर्ट की टिप्पणियाँ:

a) रोकथाम तंत्र की आवश्यकता

जस्टिस बागची ने कहा कि केवल बाद में सज़ा देना पर्याप्त नहीं; गलत सूचना, अश्लील सामग्री, आर्थिक नुकसान या हिंसा रोकने के लिए सबसे पहले रोकथाम आवश्यक है।

 

b) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा

दिशानिर्देशों से अभिव्यक्ति का दमन नहीं होना चाहिए।

 

c) ‘राष्ट्र-विरोधी’ शब्द की अस्पष्टता

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चेतावनी दी कि यह शब्द दुरुपयोग योग्य और व्यापक है।

 

d) पूर्व-सेंसरशिप की आशंका

सीनियर एडवोकेट अमित सिबल ने कहा कि ‘प्रिवेंटिव’ शब्द से ‘प्री-सेंसरशिप’ की छवि बन सकती है।

उन्होंने सुझाव दिया कि शब्द “इफेक्टिव” उपयोग किया जाए।

 

संबंधित पक्ष:

सुप्रीम कोर्ट – नई व्यवस्था चाहता है

सूचना और प्रसारण मंत्रालय – दिशानिर्देश बनाएगा

डिजिटल/सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म – शीघ्र कार्रवाई और मॉडरेशन की ज़िम्मेदारी

नागरिक समाज व उपयोगकर्ता – गोपनीयता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चिंतित

कानूनी विशेषज्ञ – सेंसरशिप के खतरे पर बहस कर रहे हैं

 

संभावित प्रभाव

a) कड़ी आयु-प्रमाणन प्रक्रिया

आधार आधारित सत्यापन गोपनीयता चिंताएँ बढ़ा सकता है, लेकिन नियंत्रण भी मजबूत करेगा।

 

b) नई स्वायत्त एजेंसी का गठन

यह सरकारी दख़ल कम कर सकता है, लेकिन इसकी स्वतंत्रता पर प्रश्न उठ सकते हैं।

 

c) तेज़ कंटेंट मॉडरेशन

प्लेटफ़ॉर्म से तेज़ प्रतिक्रिया की अपेक्षा बढ़ेगी।

 

d) अभिव्यक्ति पर असर का डर

कुछ लोगों को डर है कि अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल असहमति को दबाने में हो सकता है।

 

e) डिजिटल क्रिएटर्स पर बोझ

नए दिशानिर्देशों से क्रिएटर्स को अतिरिक्त अनुपालन करना पड़ सकता है।

 

पृष्ठभूमि:

भारत में 800 मिलियन से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं।

IT Rules 2021 में पहले से ही 24 घंटे की कार्रवाई का प्रावधान है।

कई विवादास्पद वीडियो, डीपफेक, घृणास्पद भाषण और फर्जी खबरों के मामलों ने बहस को तेज़ किया है।

 

समग्र महत्व:

यह निर्णय भारत में डिजिटल नियमन की दिशा में एक बड़ा कदम है।

सुप्रीम कोर्ट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

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