द हिंदू: 20 जनवरी 2026 को प्रकाशित:
चर्चा में क्यों है? (Why in News?)
यह मुद्दा इसलिए चर्चा में है क्योंकि भारतीय राज्यों द्वारा उधारी (Borrowing) में तेज़ वृद्धि अब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की ब्याज दरों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने की क्षमता में बाधा बनने लगी है। नीति दरों में कटौती करने के बावजूद, आरबीआई के लिए पूरी अर्थव्यवस्था में उधारी लागत को कम करना कठिन हो रहा है। इसका मुख्य कारण राज्य सरकारों के बढ़ते कर्ज का बोझ है, जिससे बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) पर ऊपर की ओर दबाव पड़ रहा है और मौद्रिक नीति का प्रभाव कमजोर हो रहा है।
RBI की आंतरिक समीक्षा से जुड़े अधिकारियों और विश्लेषकों ने इस चिंता को उजागर किया है। उनका मानना है कि आने वाले समय में राज्यों की उधारी केंद्र सरकार के बराबर या उससे भी अधिक हो सकती है, जिससे भारत की ऋण प्रबंधन और मौद्रिक नीति व्यवस्था के सामने संरचनात्मक चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ (Background and Context):
भारत में उधारी की एक दोहरी व्यवस्था है, जिसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकारें दोनों बाजार से धन जुटाती हैं।
केंद्र सरकार सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Secs) जारी करती है।
राज्य सरकारें राज्य विकास ऋण (State Development Loans – SDLs) जारी करती हैं।
इन दोनों प्रकार के बॉन्ड को मुख्य रूप से वही निवेशक खरीदते हैं—जैसे बैंक, बीमा कंपनियाँ, म्यूचुअल फंड और पेंशन फंड।
परंपरागत रूप से, बाजार में केंद्र सरकार की उधारी का वर्चस्व रहा है। लेकिन अब यह संतुलन तेज़ी से बदल रहा है। चालू वित्त वर्ष में:
राज्य सरकारों की उधारी लगभग ₹12.5 लाख करोड़ होने की संभावना है।
जबकि केंद्र सरकार की सकल उधारी लगभग ₹14.6 लाख करोड़ है।
शुद्ध उधारी के स्तर पर यह अंतर और भी कम हो जाता है। यह घटता हुआ अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बॉन्ड बाजार में पूंजी के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और इससे पूरे वित्तीय तंत्र में ब्याज दरें प्रभावित होती हैं।
राज्य सरकारों की बढ़ती उधारी चिंता का विषय क्यों है?:
1. बॉन्ड यील्ड पर दबाव
राज्य सरकारों के बॉन्ड आमतौर पर केंद्र सरकार के बॉन्ड से 80–100 बेसिस पॉइंट अधिक रिटर्न देते हैं ताकि निवेशकों को आकर्षित किया जा सके।
जब राज्य बड़ी मात्रा में ऋण जारी करते हैं:
बाजार में बॉन्ड की आपूर्ति बढ़ जाती है,
निवेशक अधिक रिटर्न की मांग करते हैं,
जिससे ब्याज दरें ऊपर चली जाती हैं।
इसका परिणाम यह होता है कि:
केंद्र सरकार के बॉन्ड की यील्ड भी बढ़ जाती है,
RBI द्वारा की गई ब्याज दर कटौती का लाभ निष्प्रभावी हो जाता है।
2. मौद्रिक नीति के संप्रेषण (Monetary Transmission) में कमजोरी
RBI ब्याज दरें इसलिए घटाता है ताकि:
ऋण सस्ता हो,
निवेश बढ़े,
उपभोग को प्रोत्साहन मिले।
लेकिन ऊँची बॉन्ड यील्ड के कारण:
बैंक ऋण सस्ता नहीं कर पाते,
कंपनियों के लिए पूंजी महँगी बनी रहती है,
आम लोगों को सस्ते ऋण का लाभ नहीं मिल पाता।
100 बेसिस पॉइंट की कटौती के बावजूद:
कॉर्पोरेट उधारी महँगी बनी रही,
दीर्घकालिक सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़ी,
मौद्रिक नीति का प्रभाव अर्थव्यवस्था तक पूरी तरह नहीं पहुँचा।
3. यील्ड कर्व में विकृति
यील्ड कर्व विभिन्न अवधियों की ब्याज दरों को दर्शाता है। राज्यों द्वारा बड़ी मात्रा में दीर्घकालिक बॉन्ड जारी करने से:
यील्ड कर्व अधिक ढलानदार (Steep) हो गया है,
लंबी अवधि की ब्याज दरें बढ़ गई हैं।
इससे:
वित्तीय बाजारों में असंतुलन बढ़ता है,
दीर्घकालिक निवेश महँगा होता है,
निजी क्षेत्र का निवेश घटता है,
सरकार के लिए ऋण प्रबंधन कठिन हो जाता है।
RBI को आशंका है कि यदि राज्यों की उधारी पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो भविष्य में ब्याज दरें ऊँची बनी रह सकती हैं, चाहे मौद्रिक नीति कितनी ही नरम क्यों न हो।
4. उप-सरकारी (Sub-Sovereign) उधारी का जोखिम
हालाँकि राज्य सरकारों का कर्ज केंद्र सरकार से अलग होता है, फिर भी निवेशक इसे लगभग जोखिममुक्त मानते हैं क्योंकि:
RBI के पास समेकित सिंकिंग फंड मौजूद है,
राज्यों को परोक्ष रूप से संप्रभु समर्थन प्राप्त है,
भारत के किसी राज्य ने अब तक डिफॉल्ट नहीं किया है।
इस कारण निवेशक अधिक रिटर्न वाले राज्य बॉन्ड की ओर झुकते हैं। नतीजतन:
केंद्र सरकार के बॉन्ड की माँग घटती है,
केंद्र को अधिक ब्याज देना पड़ता है,
भविष्य में राज्यों की उधारी केंद्र से अधिक हो सकती है।
यह स्थिति राजकोषीय दृष्टि से जोखिमपूर्ण मानी जाती है।
अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजार पर प्रभाव:
1. पूंजी की लागत में वृद्धि
बॉन्ड यील्ड बढ़ने से:
सरकार की उधारी महँगी होती है,
कंपनियों को महँगा ऋण मिलता है,
इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की लागत बढ़ती है,
आवास और दीर्घकालिक ऋण महँगे होते हैं।
इससे आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ती है।
2. निजी निवेश का निष्कासन (Crowding Out)
जब सरकारें भारी उधारी करती हैं, तो:
बाजार की अधिकांश पूंजी सरकारी ऋण में चली जाती है,
निजी कंपनियों के लिए पूंजी कम बचती है,
निवेश महँगा और कठिन हो जाता है।
3. RBI की बैलेंस शीट पर दबाव
बढ़ती यील्ड को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई को लगभग ₹5.7 लाख करोड़ के सरकारी बॉन्ड खरीदने पड़ सकते हैं।
हालाँकि इससे अस्थायी राहत मिलती है, लेकिन:
बाजार संकेत विकृत होते हैं,
RBI की बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ता है,
भविष्य में नीति लचीलापन घटता है।
राज्य अधिक उधारी क्यों कर रहे हैं?:
राज्यों की बढ़ती उधारी के प्रमुख कारण हैं:
ग्रामीण रोजगार योजनाओं सहित कल्याणकारी खर्च में वृद्धि,
बुनियादी ढाँचे पर अधिक निवेश,
कुछ योजनाओं में केंद्र से राज्यों पर वित्तीय भार का स्थानांतरण,
राजस्व वृद्धि की सीमाएँ,
सस्ते वैकल्पिक वित्तीय स्रोतों की कमी।
संभावित समाधान और नीति विकल्प:
1. केंद्र की ओर से अधिक सहायता
केंद्र सरकार राज्यों को दीर्घकालिक ब्याज-मुक्त या कम ब्याज वाले ऋण दे सकती है, जिससे बाजार से उधारी कम हो।
2. लघु बचत निधि तक पहुँच
यदि राज्यों को भी लघु बचत योजनाओं से उधार लेने की अनुमति मिले, तो बाजार पर दबाव घटेगा।
3. बेहतर ऋण प्रबंधन
राज्य सरकारें:
उधारी को विभिन्न अवधियों में बाँट सकती हैं,
एक साथ अधिक बॉन्ड जारी करने से बच सकती हैं,
वित्तीय अनुशासन सुधार सकती हैं।
4. समन्वित राजकोषीय-मौद्रिक नीति
केंद्र, राज्य और आरबीआई के बीच बेहतर समन्वय से:
तरलता दबाव घटेगा,
बॉन्ड बाजार स्थिर रहेगा,
मौद्रिक नीति का प्रभाव बेहतर होगा।
निष्कर्ष:
भारतीय राज्यों की बढ़ती उधारी अब एक गंभीर व्यापक आर्थिक चुनौती बनती जा रही है। यद्यपि विकास और कल्याण के लिए राज्यों को धन की आवश्यकता है, लेकिन अनियंत्रित उधारी से बॉन्ड बाजार में असंतुलन पैदा हो रहा है, मौद्रिक नीति कमजोर पड़ रही है और निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो इससे दीर्घकालिक रूप से उच्च ब्याज दरें, निजी निवेश में गिरावट और नीति प्रभावशीलता में कमी आ सकती है। इसलिए आवश्यक है कि वित्तीय अनुशासन, वैकल्पिक वित्तीय साधनों और केंद्र–राज्य समन्वय के माध्यम से इस समस्या का समाधान किया जाए, ताकि आर्थिक स्थिरता बनी रहे और मौद्रिक नीति प्रभावी ढंग से कार्य कर सके।