SIR के लिए इस्तेमाल किए गए ‘रिस्ट्रिक्टिव’ सॉफ्टवेयर टूल्स: SC:

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द हिंदू: 10 फरवरी 2026 को पब्लिश हुआ:

 

मुद्दा समाचारों में क्यों है?

यह मामला उस समय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया जब पश्चिम बंगाल सरकार और सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई सॉफ़्टवेयर-आधारित जाँच प्रक्रिया के कारण मतदाताओं को मामूली या स्वाभाविक त्रुटियों के आधार पर बड़ी संख्या में नोटिस भेजे गए।

राज्य के वकील के अनुसार, लगभग 1.4 करोड़ मतदाताओं को “तार्किक विसंगतियों” (logical discrepancies) की श्रेणी में रखा गया और लगभग 70 लाख लोगों को अपने नाम, आयु या पारिवारिक विवरणों में छोटे-मोटे अंतर स्पष्ट करने के लिए सुनवाई में उपस्थित होने को कहा गया।

न्यायालय ने पाया कि चुनाव आयोग द्वारा उपयोग किए गए उपकरण अत्यधिक कठोर प्रतीत होते हैं और भारतीय नामों तथा पारिवारिक संरचनाओं में सामान्य रूप से पाई जाने वाली विविधताओं को समायोजित करने में सक्षम नहीं हैं। अदालत ने पुनरीक्षण प्रक्रिया की समय-सीमा बढ़ाई और हिंसा तथा प्रशासनिक अनियमितताओं से जुड़े आरोपों पर स्पष्टीकरण मांगा। साथ ही, माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की भूमिका सीमित करते हुए यह स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय केवल नामित निर्वाचन अधिकारियों के पास ही रहेगा।

 

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को समझना:

विशेष गहन पुनरीक्षण चुनाव आयोग द्वारा किया जाने वाला एक व्यापक सत्यापन अभियान है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना है। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होता है कि मतदाता सूची सटीक हो, उसमें कोई डुप्लीकेट नाम न हों और केवल पात्र नागरिकों को ही शामिल किया जाए।

संविधान के अनुच्छेद 324 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव आयोग को इन सूचियों को तैयार करने और बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

सामान्यतः ऐसे पुनरीक्षण चुनावों की शुचिता और विश्वसनीयता को मजबूत करने के लिए किए जाते हैं। किंतु इस प्रक्रिया में दक्षता के साथ-साथ निष्पक्षता का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यदि बड़े पैमाने पर सत्यापन के दौरान वास्तविक मतदाता अनजाने में बाहर हो जाएँ, तो इससे लोकतांत्रिक वैधता ही कमजोर हो सकती है।

 

प्रतिबंधात्मक सॉफ़्टवेयर को लेकर विवाद:

विवाद का मुख्य कारण विसंगतियों की पहचान के लिए स्वचालित सॉफ़्टवेयर उपकरणों का उपयोग है। इन उपकरणों ने तथाकथित “तार्किक असंगतियों” को चिह्नित किया, जैसे:

उपनामों की वर्तनी में हल्का अंतर (Roy बनाम Ray),

“कुमार” जैसे मध्य नाम का छूट जाना, जो बंगाली परिवारों में सामान्य है,

परिवार के सदस्यों की आयु में मामूली अंतर,

दर्ज पारिवारिक संरचनाओं में भिन्नता।

 

भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में ऐसी विविधताएँ अत्यंत सामान्य हैं। क्षेत्रीय भाषाओं से अंग्रेज़ी में अनुवाद के कारण वर्तनी बदल जाना आम बात है। पुराने अभिलेखों में लिपिकीय त्रुटियाँ अक्सर मिलती हैं। कई परिवार अलग-अलग दस्तावेज़ों में नामों के भिन्न रूपों का उपयोग करते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इतनी विविध आबादी पर कठोर डिजिटल फ़िल्टर लागू करने से सामान्य भिन्नताओं को भी धोखाधड़ी समझ लेने का खतरा रहता है। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि सॉफ़्टवेयर “स्वाभाविक अंतर को समाप्त” कर रहा है, जिसका अर्थ है कि वास्तविक मतदाताओं को भी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है।

इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है — क्या कड़े तार्किक नियमों पर आधारित कोई कंप्यूटर प्रोग्राम भारतीय समाज की जटिल वास्तविकताओं को सही ढंग से समझ सकता है?

 

स्वचालन बनाम मानवीय निर्णय:

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान की यह टिप्पणी विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करने वाली थी कि “कंप्यूटर एक तानाशाह बन गया है।”

इस कथन से समस्या का सार स्पष्ट होता है। तकनीक का उद्देश्य प्रशासनिक निर्णयों में सहायता करना है, न कि मानवीय विवेक को पूरी तरह प्रतिस्थापित करना। जब सॉफ़्टवेयर बिना संदर्भ समझे स्वतः नोटिस जारी करता है या विसंगतियाँ चिह्नित करता है, तो प्रक्रिया यांत्रिक और अन्यायपूर्ण हो जाती है।

उदाहरण के लिए, यदि वर्तनी में मामूली अंतर हो, तो स्थानीय अधिकारी आसानी से पहचान सकता है कि वह वही व्यक्ति है, फिर भी सॉफ़्टवेयर सुनवाई का नोटिस जारी कर देता है। इससे अनावश्यक परेशानी और प्रशासनिक बोझ बढ़ता है।

इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने जोर दिया कि अंतिम निर्णय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के पास ही रहना चाहिए, जिनके पास स्थानीय जानकारी और विवेक का उपयोग करने की क्षमता होती है। मशीनें केवल पैटर्न पहचान सकती हैं, परंतु उनका सही अर्थ मनुष्य ही समझ सकता है।

 

मतदाताओं और लोकतांत्रिक भागीदारी पर प्रभाव:

इस अभ्यास का विशाल पैमाना समस्या को और गंभीर बना देता है। यदि 70 लाख लोगों को सुनवाई के लिए बुलाया जाता है, तो नागरिकों पर अत्यधिक बोझ पड़ता है। विशेष रूप से बुजुर्ग, गरीब, ग्रामीण निवासी या दिहाड़ी मजदूरों के लिए बार-बार केंद्रों तक जाना या दस्तावेज़ प्रस्तुत करना कठिन हो सकता है।

इससे “वास्तविक मताधिकार से वंचित होने” (de facto disenfranchisement) का खतरा पैदा होता है। भले ही औपचारिक रूप से नाम न हटाए जाएँ, प्रक्रिया स्वयं लोगों को भागीदारी से हतोत्साहित कर सकती है।

लोकतंत्र केवल कानूनी अधिकारों पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक पहुंच पर भी निर्भर करता है। भारत जैसे देश में, जहाँ दस्तावेज़ी कमियाँ सामान्य हैं, कठोर सत्यापन प्रणाली कमजोर वर्गों को असमान रूप से प्रभावित कर सकती है। इस प्रकार, जो एक तकनीकी सुधार प्रक्रिया प्रतीत होती है, वह अनजाने में सामाजिक बहिष्कार का कारण बन सकती है।

 

संघीय और प्रशासनिक तनाव:

इस मामले ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच तनाव को भी उजागर किया। केंद्र सेवाओं से माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की नियुक्ति पर राज्य ने आपत्ति जताई, यह कहते हुए कि उन्हें स्थानीय परिस्थितियों की जानकारी नहीं है और वे राज्य अधिकारियों के अधिकारों को कम कर रहे हैं।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर्स केवल सहायता करेंगे, वे EROs का स्थान नहीं ले सकते। यह चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और राज्य मशीनरी की सहयोगात्मक भूमिका के बीच संतुलन को दर्शाता है।

 

कानूनी और संवैधानिक निहितार्थ:

यद्यपि मतदान का अधिकार तकनीकी रूप से एक वैधानिक अधिकार है, फिर भी यह समानता, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक भागीदारी जैसे संवैधानिक सिद्धांतों से गहराई से जुड़ा है।

किसी भी प्रक्रिया द्वारा मनमाने ढंग से मतदाताओं को बाहर करना अनुच्छेद 14 और 21 की भावना का उल्लंघन हो सकता है, जो कानून के समक्ष समानता और न्यायपूर्ण प्रक्रिया की गारंटी देते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप दर्शाता है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक रूप से स्वतंत्र निकाय भी तब न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं जब मूल लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रश्न उठते हैं।

 

व्यापक सबक : शासन में तकनीक की भूमिका:

यह घटना केवल चुनावों तक सीमित नहीं है। आजकल शासन के विभिन्न क्षेत्रों में डिजिटल उपकरणों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालित प्रणालियों का उपयोग बढ़ रहा है — जैसे कल्याणकारी योजनाओं का वितरण, पहचान सत्यापन आदि।

हालाँकि ये उपकरण दक्षता बढ़ाते हैं, लेकिन इनमें जोखिम भी हैं:

एल्गोरिदमिक पक्षपात

पारदर्शिता की कमी

मानवीय विवेक का अभाव

वंचित समूहों का बहिष्कार

पश्चिम बंगाल SIR विवाद यह स्पष्ट करता है कि तकनीक को मानवीय वास्तविकताओं के अनुरूप ढालना चाहिए, न कि लोगों को तकनीक के अनुरूप।

 

आगे का रास्ता:

समाधान तकनीक को त्यागना नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदारी से उपयोग करना है। सॉफ़्टवेयर में छोटी-मोटी त्रुटियों के लिए लचीलापन होना चाहिए। एल्गोरिदम पारदर्शी हों और उनका नियमित ऑडिट किया जाए। सबसे महत्वपूर्ण, मानवीय निगरानी निर्णय-प्रक्रिया का केंद्र बनी रहनी चाहिए।

मतदाता सत्यापन प्रक्रिया नागरिक-अनुकूल होनी चाहिए, जिसमें सरल शिकायत निवारण व्यवस्था और न्यूनतम प्रक्रियागत बोझ हो। आखिरकार, चुनावों का उद्देश्य मतदाताओं को शामिल करना है, न कि बाहर करना।

 

निष्कर्ष:

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ यह महत्वपूर्ण संदेश देती हैं कि लोकतंत्र को कठोर एल्गोरिदम के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। स्वच्छ मतदाता सूची बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन इस प्रक्रिया को समाज की विविधता और वास्तविकताओं का सम्मान करना चाहिए।

तकनीक को लोकतंत्र का समर्थन करना चाहिए, उस पर हावी नहीं होना चाहिए। यदि कंप्यूटर बिना पर्याप्त मानवीय विवेक के यह तय करने लगें कि कौन मतदान करेगा, तो इससे लोकतांत्रिक अधिकार ही कमजोर पड़ सकते हैं।

इस दृष्टि से, न्यायालय का हस्तक्षेप केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सहभागी लोकतंत्र की रक्षा है।

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