स्रोत: द हिंदू
संदर्भ: न्यायिक निर्णय लेने में संख्यात्मक बहुमत की अंधी स्वीकृति और असहमतिपूर्ण निर्णयों में तर्कों और साक्ष्यों के विश्लेषण और प्रशंसा की संवैधानिक अवहेलना हाल ही में विमुद्रीकरण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समाचारों है।
न्यायिक बहुसंख्यकवाद क्या है?
न्यायिक बहुसंख्यकवाद के साथ एक मुद्दा:
न्यायिक निकायों के संख्यात्मक बहुमत को बिना किसी बहस के क्यों स्वीकार किया जाता है, जबकि लोकसभा जैसे प्रतिनिधि निकायों में संख्यात्मक बहुमत को अक्सर संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
न्यायिक बहुसंख्यकवाद की अवधारणा पर चिंतन करें:
संवैधानिक इतिहास:
ए.डी.एम. मामले में न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना की असहमतिपूर्ण राय जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल (1976) संवैधानिक असाधारणता की स्थितियों के दौरान भी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखना एक प्रमुख उदाहरण है।
एक अन्य उदाहरण खड़क सिंह बनाम यूपी राज्य में न्यायमूर्ति सुब्बा राव की असहमतिपूर्ण राय है। (1962) निजता के अधिकार को बरकरार रखने वाला मामला जिसे के.एस. पुट्टास्वामी बनाम यूओआई (2017) मामला बताया गया।
समाधान/आगे का रास्ता:
वरिष्ठता-आधारित मूल्यांकन: रोनाल्ड डॉर्किन एक ऐसी प्रणाली का प्रस्ताव करते हैं जो या तो वरिष्ठ न्यायाधीशों के वोट को अधिक महत्व दे सकती है क्योंकि उनके पास अधिक अनुभव है या कनिष्ठ न्यायाधीशों के लिए क्योंकि वे लोकप्रिय राय का बेहतर प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
आलोचनात्मक प्रवचन को शामिल करें
जाति जनगणना के प्रति अलग दृष्टिकोण:
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