भारत–अमेरिका व्यापार समझौता अनिश्चितता: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद

भारत–अमेरिका व्यापार समझौता अनिश्चितता: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद

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The Hindu: 21 फरवरी 2026 को प्रकाशित

 

यह मुद्दा चर्चा में क्यों है?

भारत–अमेरिका व्यापार संबंध एक बार फिर सुर्खियों में आ गए हैं, जब Supreme Court of the United States ने Donald Trump द्वारा पहले लगाए गए कई “पारस्परिक टैरिफ (Reciprocal Tariffs)” के कानूनी आधार को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति शांतिकाल में व्यापक टैरिफ लगाने के लिए International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) का उपयोग नहीं कर सकते।

इसके जवाब में राष्ट्रपति ट्रंप ने Trade Act की Section 122 का हवाला देते हुए एक नया कार्यकारी आदेश जारी किया, जिसके तहत भारत सहित सभी देशों से आयात पर अस्थायी रूप से 10% टैरिफ लगाया गया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भारत पर Narendra Modi के साथ हुए हालिया व्यापार समझौते के अनुसार 18% टैरिफ लागू रहेगा।

यह स्पष्ट विरोधाभासनए आदेश के तहत 10% और व्यापार समझौते के तहत 18%—भारतीय निर्यातकों और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर रहा है। यह मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसमें न्यायिक हस्तक्षेप, कार्यपालिका की शक्ति, व्यापार कूटनीति और प्रमुख क्षेत्रों पर आर्थिक प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं।

 

पृष्ठभूमि: कानूनी और नीतिगत संदर्भ

 

1. टैरिफ के लिए IEEPA का उपयोग

International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे किसी असामान्य या असाधारण विदेशी खतरे की स्थिति में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर व्यापार को नियंत्रित कर सकें। राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले इसी कानून का उपयोग करते हुए कई देशों पर “पारस्परिक टैरिफ” लगाए थे, यह तर्क देते हुए कि व्यापार घाटा एक आर्थिक खतरा है।

हालांकि, आलोचकों का कहना था कि व्यापार घाटा IEEPA के तहत राष्ट्रीय आपातकाल की श्रेणी में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी तर्क से सहमति जताई और निर्णय दिया कि शांतिकाल में बिना स्पष्ट संसदीय अनुमति के इस अधिनियम का उपयोग कर व्यापक टैरिफ नहीं लगाए जा सकते। इस निर्णय से भारत सहित कई देशों पर लागू पहले के टैरिफ ढांचे को अमान्य कर दिया गया।

 

2. Section 122 का आह्वान

न्यायालय के निर्णय के तुरंत बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने Trade Act, 1974 की Section 122 का सहारा लिया। यह कम उपयोग किया जाने वाला प्रावधान राष्ट्रपति को भुगतान संतुलन (Balance of Payments) की समस्या से निपटने के लिए अधिकतम 150 दिनों तक 15% तक का अस्थायी टैरिफ लगाने की अनुमति देता है, जिसके लिए तत्काल कांग्रेस की अनुमति आवश्यक नहीं होती।

इसी प्रावधान के तहत सभी देशों से आयात पर 10% का समान टैरिफ घोषित किया गया, जो 24 फरवरी से प्रभावी होगा। इसे न्यायिक झटके के बाद टैरिफ शक्ति को पुनः स्थापित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

 

मुख्य भ्रम: 10%, 13.5% या 18%?

भारतीय वस्तुओं पर वास्तविक टैरिफ दर क्या होगी, यही इस पूरे विवाद का केंद्रीय प्रश्न है:

  • 10% टैरिफ: कानूनी रूप से, Trade Act की Section 122 के तहत सभी देशों—भारत सहित—पर अस्थायी रूप से 10% टैरिफ लागू होना चाहिए।
  • 18% टैरिफ: Donald Trump ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि भारत पर पहले हुए व्यापार समझौते के अनुसार 18% टैरिफ ही लागू रहेगा।
  • 13.5% का अनुमान: कुछ व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नए 10% टैरिफ को मौजूदा 3.5% मानक दर में जोड़ा जाए, तो प्रभावी दर लगभग 13.5% हो सकती है। हालांकि, इस गणना की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

बाद में व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि तकनीकी रूप से जिन देशों के साथ व्यापार समझौते हैं, वे भी अस्थायी रूप से 10% दर पर आ जाएंगे। राजनीतिक बयान और कानूनी व्याख्या के बीच यह विरोधाभास निर्यातकों के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर रहा है।

 

भारत पर क्षेत्रीय (Sectoral) प्रभाव

 

  1. स्टील और एल्युमिनियम: Section 232 (राष्ट्रीय सुरक्षा आधार) के तहत लगाए गए कुछ टैरिफ अप्रभावित रहेंगे:
  • स्टील: 50%
  • एल्युमिनियम: 50%

ये ऊँचे टैरिफ भारतीय धातु निर्यातकों को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। Section 232 के टैरिफ, IEEPA-आधारित टैरिफ से अलग कानूनी आधार पर हैं और अभी भी वैध बने हुए हैं।

 

  1. ऑटो कंपोनेंट्स: कुछ विशेष ऑटो पार्ट्स पर 25% टैरिफ जारी रहेगा। इससे भारत के तेजी से बढ़ते ऑटो-कंपोनेंट उद्योग पर असर पड़ेगा, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

 

  1. वस्त्र और परिधान: United States भारतीय वस्त्र और परिधान का प्रमुख बाजार है। यदि टैरिफ 18% रहता है, तो भारतीय निर्यातक वियतनाम या बांग्लादेश जैसे देशों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं। 10% दर होने पर उन्हें राहत मिलेगी और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

 

  1. रत्न और आभूषण: भारत का रत्न एवं आभूषण क्षेत्र अमेरिकी मांग पर काफी निर्भर है। कम टैरिफ इस श्रम-प्रधान क्षेत्र को मजबूती देगा, जो लाखों लोगों को रोजगार देता है।

 

  1. एमएसएमई और विनिर्माण: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs), विशेषकर श्रम-प्रधान क्षेत्रों में, कम टैरिफ से लाभान्वित होंगे। 18% दर लागू होने पर लाभ मार्जिन घट सकते हैं और निर्यात ऑर्डर कम हो सकते हैं।

 

भारत के लिए आर्थिक प्रभाव

 

  1. निर्यात प्रतिस्पर्धा: टैरिफ सीधे आयातित वस्तुओं की अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं। अधिक टैरिफ का अर्थ है अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए अधिक कीमत, जिससे भारतीय उत्पादों की मांग घट सकती है। यदि दर:
  • 10% रहती है → भारतीय वस्तुएँ अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी बनी रहेंगी।
  • 18% होती है → निर्यात मात्रा में उल्लेखनीय गिरावट संभव है।
  1. व्यापार संतुलन: अमेरिका, भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। यदि निर्यात घटते हैं और अमेरिका से आयात जारी रहता है, तो भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है।
  2. निवेश माहौल: टैरिफ दरों में अनिश्चितता निवेशकों के विश्वास को प्रभावित करती है। निर्यात-उन्मुख उद्योग स्पष्टता आने तक विस्तार योजनाओं को टाल सकते हैं, जिससे उत्पादन और रोजगार पर असर पड़ सकता है।

 

रणनीतिक और कूटनीतिक आयाम

भारत–अमेरिका व्यापार संबंध केवल आर्थिक लेन-देन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा हैं। यह साझेदारी रक्षा सहयोग, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा, सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं और उन्नत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जैसे क्षेत्रों को भी शामिल करती है।

इसलिए, टैरिफ विवाद भले ही आर्थिक प्रकृति का हो, लेकिन इसका प्रभाव भू-राजनीतिक संबंधों पर भी पड़ता है। Supreme Court of the United States के हालिया निर्णय ने भारत की कानूनी और वार्तात्मक स्थिति को मजबूत किया है। चूँकि पहले लगाए गए उच्च “पारस्परिक टैरिफ” को अमान्य कर दिया गया है, भारत अब नए 10% टैरिफ ढांचे के तहत समान व्यवहार की मांग कर सकता है।

वॉशिंगटन डीसी में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की प्रस्तावित यात्रा इस बात का संकेत है कि दोनों देश इस भ्रम को सुलझाने के लिए सक्रिय कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं।

 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कानूनी महत्व

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है:

  • कार्यपालिका की शक्ति पर सीमा: यह फैसला व्यापार नीति में कांग्रेस की प्राथमिकता को पुनः स्थापित करता है और राष्ट्रपति की एकतरफा टैरिफ लगाने की शक्ति को सीमित करता है।
  • भविष्य के मामलों के लिए मिसाल: भविष्य में यदि कोई राष्ट्रपति आपातकालीन कानूनों का उपयोग आर्थिक उपायों के लिए करना चाहेंगे, तो उन्हें न्यायिक समीक्षा का सामना करना पड़ सकता है।
  • शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers): यह निर्णय अमेरिकी शासन प्रणाली में संवैधानिक संतुलन और नियंत्रण (checks and balances) को मजबूत करता है।

भारत के लिए, यह फैसला अप्रत्यक्ष रूप से लाभकारी है क्योंकि इससे पहले लगाए गए उच्च टैरिफ का कानूनी आधार कमजोर हो गया है, जिससे उसकी वार्ता की स्थिति मजबूत होती है।

 

संयुक्त राज्य अमेरिका में राजनीतिक संदर्भ

Donald Trump की नई टैरिफ रणनीति उनकी संरक्षणवादी (protectionist) आर्थिक नीति के अनुरूप है। सार्वभौमिक 10% टैरिफ लगाकर उन्होंने यह संकेत दिया है कि वे घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।

हालांकि, 18% और 10% के बीच का विरोधाभास आंतरिक नीतिगत बहस या वार्ता रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। व्यापार वार्ताओं में टैरिफ अक्सर सौदेबाजी के उपकरण के रूप में उपयोग किए जाते हैं। संभव है कि 18% का उच्च आंकड़ा भारत के साथ बातचीत के दौरान दबाव बनाने या बेहतर शर्तें हासिल करने के लिए एक रणनीतिक कदम हो।

 

आगे की संभावित स्थितियाँ (Possible Scenarios Ahead)

  • परिदृश्य 1: समान 10% टैरिफ दर: यदि व्हाइट हाउस की आधिकारिक स्पष्टीकरण को अंतिम रूप दिया जाता है, तो भारतीय वस्तुओं पर अस्थायी रूप से 10% टैरिफ लागू होगा। इससे व्यापार संबंधों में स्थिरता आएगी और भारतीय निर्यातकों को राहत मिलेगी। कम टैरिफ से प्रतिस्पर्धात्मकता बनी रहेगी और निर्यात में गिरावट की आशंका कम होगी।
  • परिदृश्य 2: द्विपक्षीय समझौते के तहत 18% दर: यदि पहले हुए व्यापार समझौते को लागू किया जाता है, तो भारतीय निर्यात पर 18% टैरिफ लग सकता है। इससे भारतीय उत्पादों की लागत बढ़ेगी और अमेरिका के बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है। ऐसी स्थिति में दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ सकता है और समझौते के पुनः वार्ता (renegotiation) की मांग उठ सकती है।
  • परिदृश्य 3: वार्ता के माध्यम से समझौता: भारत और United States के बीच मध्य मार्ग का समाधान निकल सकता है। इसमें क्षेत्र-विशिष्ट रियायतें, चरणबद्ध टैरिफ समायोजन या विशेष उत्पादों के लिए अलग व्यवस्था शामिल हो सकती है। यह समाधान कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होगा।

 

वैश्विक व्यापार पर प्रभाव (Implications for Global Trade)

यह विकास केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है:

  • यह कार्यपालिका के व्यापारिक निर्णयों पर न्यायिक निगरानी (judicial oversight) को उजागर करता है।
  • यह अमेरिकी व्यापार नीति में संभावित अस्थिरता का संकेत देता है।
  • जिन अन्य देशों पर पहले “पारस्परिक टैरिफ” लगाए गए थे, वे भी अब पुनः वार्ता की मांग कर सकते हैं।
  • इस प्रकार, यह मामला वैश्विक व्यापार व्यवस्था में कानूनी और नीतिगत अनिश्चितता को रेखांकित करता है।

 

भारत के रणनीतिक विकल्प (India’s Strategic Options)

  • कूटनीतिक संवाद: उच्च-स्तरीय वार्ताओं के माध्यम से टैरिफ संरचना को स्पष्ट करना और स्थिरता सुनिश्चित करना।
  • WTO तंत्र का उपयोग: यदि भेदभावपूर्ण टैरिफ जारी रहते हैं, तो भारत बहुपक्षीय मंचों, विशेषकर WTO, का सहारा ले सकता है।
  • निर्यात विविधीकरण: यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बाजारों में विस्तार कर किसी एक देश पर निर्भरता कम करना।
  • घरेलू सुधार: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI), लॉजिस्टिक्स सुधार और गुणवत्ता उन्नयन के माध्यम से प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना।

 

व्यापक आर्थिक संदर्भ (Broader Economic Context)

United States भारत के सबसे बड़े निर्यात गंतव्यों में से एक है। प्रमुख निर्यात श्रेणियों में फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाएँ, वस्त्र, इंजीनियरिंग सामान और आभूषण शामिल हैं। टैरिफ संबंधी अनिश्चितता ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक व्यापार पहले ही भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव और संरक्षणवादी नीतियों के कारण प्रभावित हो रहा है। स्थिर और स्पष्ट टैरिफ व्यवस्था भारत की निर्यात-आधारित विकास रणनीति के लिए अत्यंत आवश्यक है।

 

निष्कर्ष

भारत–अमेरिका टैरिफ विवाद इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह न्यायिक हस्तक्षेप, कार्यपालिका की शक्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार कूटनीति के संगम को दर्शाता है। Supreme Court of the United States के निर्णय ने पहले की टैरिफ व्यवस्था को बाधित किया और एक नई कार्यकारी प्रतिक्रिया को जन्म दिया।

मूल प्रश्न अभी भी यही है: क्या भारतीय वस्तुओं पर 10% टैरिफ लागू होगा, 18% या कोई मध्यवर्ती दर? इसका सीधा प्रभाव भारतीय निर्यातकों—विशेषकर वस्त्र, रत्न, स्टील और ऑटो कंपोनेंट क्षेत्रों—पर पड़ेगा। साथ ही, यह भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों की भविष्य दिशा को भी निर्धारित करेगा।

हालाँकि कानूनी स्थिति फिलहाल 10% अस्थायी टैरिफ की ओर संकेत करती है, राजनीतिक बयानों से स्पष्ट है कि वार्ताएँ जारी हैं। आने वाले सप्ताह, विशेषकर वॉशिंगटन में कूटनीतिक बैठकों के परिणाम, अंतिम स्थिति तय करेंगे।

अंततः, यह प्रकरण दर्शाता है कि किसी देश का आंतरिक न्यायिक निर्णय भी वैश्विक व्यापार गतिशीलता को प्रभावित कर सकता है और परस्पर निर्भर विश्व में आर्थिक कूटनीति राष्ट्रीय हितों की रक्षा में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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