भारत–यूके एआई और दूरसंचार साझेदारी को मजबूत करेंगे

भारत–यूके एआई और दूरसंचार साझेदारी को मजबूत करेंगे

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PIB: 18 फरवरी 2026 को प्रकाशित

 

यह चर्चा में क्यों है?

भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच प्रौद्योगिकी सहयोग को और गहरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया, जब नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), दूरसंचार और उभरती डिजिटल प्रौद्योगिकियों पर चर्चा को आगे बढ़ाया गया।

यह बैठक भारत सरकार के संचार राज्य मंत्री श्री डॉ. पेम्मासानी चंद्र शेखर और यूनाइटेड किंगडम के एआई एवं ऑनलाइन सुरक्षा के संसदीय अवर-सचिव श्री कनिष्क नारायण के बीच हुई। यह सहभागिता डिजिटल अवसंरचना, नवाचार शासन और विश्वसनीय तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र के भविष्य को आकार देने में दोनों देशों के बीच बढ़ते सामंजस्य को दर्शाती है।

यह विकास केवल एक कूटनीतिक संवाद भर नहीं है, बल्कि एक व्यापक परिवर्तन का हिस्सा है, जिसमें एआई और दूरसंचार आर्थिक शक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक मानकीकरण के प्रमुख आधार बनते जा रहे हैं।

 

रणनीतिक संदर्भ: भू-राजनीतिक उपकरण के रूप में प्रौद्योगिकी

भारत और यूके के बीच तकनीकी सहयोग इंडिया–यूके 2030 रोडमैप और यूके–इंडिया टेक्नोलॉजी सिक्योरिटी इनिशिएटिव (TSI) के ढांचे के अंतर्गत संचालित होता है। ये दोनों ढांचे नवाचार, सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखलाओं और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में सहयोगात्मक अनुसंधान पर बल देते हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता विश्वभर में दूरसंचार नेटवर्क को तेजी से परिवर्तित कर रही है। पारंपरिक दूरसंचार प्रणालियाँ अब मशीन लर्निंग, प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स और उन्नत साइबर सुरक्षा उपकरणों द्वारा संचालित बुद्धिमान एवं स्वचालित पारिस्थितिकी तंत्र में विकसित हो रही हैं।

भारत और यूके के लिए एआई और दूरसंचार के इस संगम में नेतृत्व करना विकल्प नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने और सुरक्षित डिजिटल विकास सुनिश्चित करने की अनिवार्यता है।

भारत अपने व्यापक पैमाने, तीव्र अवसंरचना विस्तार और डिजिटल सार्वजनिक नवाचार के साथ इस साझेदारी में योगदान देता है। वहीं, यूके गहन अनुसंधान क्षमताएँ, नियामकीय विशेषज्ञता और वैश्विक मानकीकरण संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी प्रदान करता है। दोनों मिलकर एक पूरक साझेदारी का निर्माण करते हैं, जो वैश्विक प्रौद्योगिकी दिशा को प्रभावित करने में सक्षम है।

 

भविष्य के दूरसंचार नेटवर्क का मूल आधार: एआई

बैठक का एक प्रमुख विषय यह था कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अगली पीढ़ी के दूरसंचार नेटवर्क को परिभाषित करेगी। एआई-आधारित नेटवर्क में निम्न क्षमताएँ हो सकती हैं:

  • स्वयं कॉन्फ़िगर और स्वयं अनुकूलित।
  • व्यवधान होने से पहले विफलताओं का पूर्वानुमान।
  • रियल टाइम में साइबर खतरों की पहचान और निष्क्रियकरण।
  • स्पेक्ट्रम दक्षता में सुधार।

यह परिवर्तन पारंपरिक प्रतिक्रियात्मक नेटवर्क प्रबंधन से स्वायत्त और बुद्धिमान प्रणालियों की ओर संक्रमण को दर्शाता है। एआई-संचालित दूरसंचार नवाचार में भारत और यूके के बीच सहयोग से ऐसे नेटवर्क के विकास में तेजी आ सकती है जो विस्तार योग्य (scalable), सुरक्षित (secure) और परस्पर संचालन योग्य (interoperable) हों।

 

ओपन RAN और 6G की ओर अग्रसर

एक अन्य महत्वपूर्ण फोकस ओपन रेडियो एक्सेस नेटवर्क (Open RAN) और भविष्य के 6G पारिस्थितिकी तंत्र में सहयोग पर था। ओपन RAN एकल विक्रेताओं पर निर्भरता कम करता है और दूरसंचार अवसंरचना में पारस्परिक संचालन को बढ़ावा देता है। यह सुरक्षित और विविध आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण के साझा लक्ष्य के अनुरूप है।

भारत जहाँ तेजी से 5G अवसंरचना का विस्तार कर रहा है और 6G अनुसंधान की तैयारी कर रहा है, वहीं यूके उन्नत दूरसंचार अनुसंधान एवं विकास (R&D) में सक्रिय रूप से संलग्न है। इस क्षेत्र में संयुक्त प्रयास वैश्विक मानकों को आकार दे सकते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) और 3GPP जैसे मंचों पर समन्वित भागीदारी पर जोर यह दर्शाता है कि दोनों देश सामूहिक रूप से वैश्विक दूरसंचार शासन को प्रभावित करने का इरादा रखते हैं।

 

संस्थागत तंत्र और कार्यान्वयन

दूरसंचार विभाग (DoT)–DCMS के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत हुई प्रगति की समीक्षा की गई, और दोनों पक्षों ने भारत–यूके कनेक्टिविटी और इनोवेशन सेंटर के संचालन का स्वागत किया। ऐसे संस्थागत तंत्र रणनीतिक दृष्टि को व्यावहारिक सहयोग में बदलने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संरचित सहयोग में शामिल हो सकते हैं:

  • संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम
  • एआई-सक्षम नेटवर्क में पायलट परियोजनाएँ
  • स्टार्टअप सहयोग और नवाचार आदान-प्रदान
  • शैक्षणिक साझेदारियाँ

ये उपाय सुनिश्चित करते हैं कि सहयोग केवल संवाद तक सीमित न रहे, बल्कि ठोस तकनीकी प्रगति में परिवर्तित हो।

 

क्वांटम संचार और सुरक्षित अवसंरचना

चर्चा में भारत के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन और क्वांटम संचार के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला गया। क्वांटम प्रौद्योगिकियाँ अत्यंत सुरक्षित संचार प्रणालियों और पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी में महत्वपूर्ण प्रगति का वादा करती हैं।

इस क्षेत्र में संयुक्त प्रयास सुरक्षित नेटवर्क संरचना को मजबूत कर सकते हैं और दोनों देशों को भविष्य की साइबर सुरक्षा चुनौतियों के लिए तैयार कर सकते हैं। जैसे-जैसे साइबर खतरे अधिक जटिल होते जा रहे हैं, क्वांटम-सुरक्षित नेटवर्क में निवेश केवल शोध की आकांक्षा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता बनता जा रहा है।

 

साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकथाम के लिए एआई

डिजिटल विश्वास (Digital Trust) भी चर्चाओं का एक प्रमुख स्तंभ रहा। भारत ने अपनी पहलों को साझा किया, जैसे:

  • फाइनेंशियल फ्रॉड रिस्क इंडिकेटर (FRI)
  • संचार साथी प्लेटफॉर्म
  • एआई-आधारित एंटी-स्पैम और धोखाधड़ी पहचान उपकरण
  • वहीं, यूके ने दूरसंचार धोखाधड़ी और डिजिटल घोटालों से निपटने के लिए ओपन डेटा फ्रेमवर्क और सख्त नियामकीय प्रतिरोधात्मक उपायों (Regulatory Deterrence) के उपयोग को रेखांकित किया।

यह विचार-विमर्श एक साझा समझ को दर्शाता है कि मजबूत सुरक्षा उपायों के बिना डिजिटल विस्तार जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है। एआई-आधारित धोखाधड़ी रोकथाम में सहयोग उपभोक्ता विश्वास को मजबूत करता है और डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित बनाता है।

 

स्पेक्ट्रम नवाचार और गैर-स्थलीय नेटवर्क

उभरती प्रौद्योगिकियाँ जैसे गैर-स्थलीय नेटवर्क (NTN), जिनमें उपग्रह और हवाई कनेक्टिविटी शामिल हैं, पर भी चर्चा की गई। एआई गतिशील स्पेक्ट्रम साझा करने और बैंडविड्थ आवंटन के अनुकूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इस क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान ग्रामीण कनेक्टिविटी, आपदा लचीलापन (Disaster Resilience) और सार्वभौमिक पहुंच को बढ़ावा दे सकता है। भारत के लिए, जहाँ ग्रामीण विस्तार एक नीतिगत प्राथमिकता है, और यूके के लिए, जो मजबूत अवसंरचना को महत्व देता है, स्पेक्ट्रम नवाचार में सहयोग पारस्परिक लाभ प्रदान करता है।

 

वैश्विक शासन और बहुपक्षीय समन्वय

भारत ने अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) में प्रमुख बहुपक्षीय सहभागिताओं के लिए यूके का समर्थन मांगा, जिनमें शामिल हैं:

  • रेडियोकम्युनिकेशन ब्यूरो के निदेशक पद हेतु सुश्री एम. रेवती की उम्मीदवारी।
  • 2027–2030 के लिए ITU परिषद में भारत का पुनः निर्वाचन।
  • ITU प्लेनिपोटेंशियरी सम्मेलन (PP-2030) की मेजबानी का भारत का प्रस्ताव।

ये प्रयास वैश्विक दूरसंचार शासन में अग्रणी भूमिका निभाने की भारत की आकांक्षा को दर्शाते हैं। इन पहलों में यूके का समर्थन अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण प्रक्रियाओं में सहयोगात्मक प्रभाव को मजबूत करेगा।

वैश्विक मंचों में सक्रिय भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि उभरती प्रौद्योगिकियाँ खुलापन, समावेशिता और विश्वास के सिद्धांतों द्वारा संचालित हों, न कि खंडित नियामकीय व्यवस्थाओं द्वारा।

 

भारत की डिजिटल क्षमताएँ और साझा अवसर

भारत का तीव्र 5G विस्तार, ग्रामीण कनेक्टिविटी का प्रसार और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का विकास उन्नत एआई एकीकरण के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। बड़े पैमाने पर तैनाती (Large-scale deployment) की क्षमता एआई समाधानों का जनसंख्या स्तर पर वास्तविक परीक्षण संभव बनाती है।

यूके के लिए यह सहयोग उच्च-प्रभाव वाले कार्यान्वयन परिवेश तक पहुंच प्रदान करता है, जबकि भारत के लिए यूके के साथ अनुसंधान साझेदारी नवाचार की गहराई और वैश्विक पहुंच को सुदृढ़ करती है।

यह समन्वय दोनों देशों को ऐसे डिजिटल मॉडल सह-विकसित करने में सक्षम बनाता है, जो विस्तार योग्य (scalable) और निर्यात योग्य (exportable) हों, और जिनसे विशेषकर ग्लोबल साउथ के देशों को लाभ मिल सकता है।

 

व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव

एआई और दूरसंचार के क्षेत्र में भारत–यूके साझेदारी व्यापक रणनीतिक सामंजस्य को दर्शाती है। तकनीकी विखंडन और बढ़ते डिजिटल राष्ट्रवाद के दौर में साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और विश्वास-आधारित शासन पर आधारित सहयोग एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है। यह साझेदारी केवल भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से प्रेरित नहीं है, बल्कि निम्नलिखित सिद्धांतों पर बल देती है:

  • सुरक्षित नवाचार
  • खुले मानक
  • जिम्मेदार एआई तैनाती
  • समावेशी डिजिटल विकास

इस प्रकार का सहयोग एक स्थिर और नियम-आधारित वैश्विक डिजिटल व्यवस्था को सुदृढ़ करता है।

 

भविष्य की दिशा: दृष्टि से क्रियान्वयन तक

दीर्घकालिक प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए संरचित और निरंतर अनुवर्ती कार्रवाई आवश्यक होगी। आगे की प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं:

  • संयुक्त अनुसंधान एवं विकास (R&D) वित्तपोषण को गहरा करना
  • स्टार्टअप सहयोग का विस्तार
  • नियामकीय संवाद को सुदृढ़ करना
  • वैश्विक मानकीकरण मंचों में समन्वित रणनीति अपनाना

दीर्घकालिक सफलता के लिए सतत संस्थागत सहभागिता, स्पष्ट लक्ष्य और मापनीय उपलब्धियाँ, तथा उद्योग जगत की सक्रिय भागीदारी आवश्यक होगी।

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