द हिंदू: 19 जनवरी 2026 को प्रकाशित:
समाचार में क्यों?
भारत ने अपने आर्थिक और तकनीकी विकास के क्षेत्र में एक निर्णायक चरण में प्रवेश कर लिया है, जहाँ ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का तीव्र रूपांतरण देखा जा रहा है। जो केंद्र कभी कम लागत वाले आउटसोर्सिंग यूनिट के रूप में शुरू हुए थे, वे अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए रणनीतिक वैश्विक केंद्र बन चुके हैं, जो नवाचार, उत्पाद विकास और कॉर्पोरेट निर्णय-निर्माण को दिशा देते हैं।
2026 की शुरुआत तक भारत उन्नत डिजिटल कार्यों के लिए एक वैश्विक तंत्रिका केंद्र (Global Nerve Centre) के रूप में उभर चुका है। देश में 1,800 से अधिक GCCs कार्यरत हैं, जिनमें लगभग 20 लाख पेशेवर कार्य कर रहे हैं। ये केंद्र अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर डिजाइन, साइबर सुरक्षा संरचना और कॉर्पोरेट रणनीति निर्माण जैसे जटिल कार्यों को संभाल रहे हैं।
GCCs की बढ़ती भूमिका के कारण भारत की GDP में योगदान, रोजगार सृजन और तकनीकी आत्मनिर्भरता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। साथ ही, साइबर सुरक्षा, वैश्विक कर सुधार, कुशल मानव संसाधन की कमी और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं जैसी नई चुनौतियाँ भी उभरकर सामने आई हैं। इन्हीं कारणों से यह विषय वर्तमान में आर्थिक नीति-निर्माताओं और रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच चर्चा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
पृष्ठभूमि: भारत में GCCs का विकास:
भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स की यात्रा विभिन्न चरणों में विकसित हुई है, जो वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भारत की बढ़ती परिपक्वता को दर्शाती है।
प्रारंभिक चरण (1990 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती वर्षों) में GCCs की स्थापना मुख्य रूप से भारत की सस्ती और कुशल श्रम शक्ति का लाभ उठाने के लिए की गई थी। इनका कार्यक्षेत्र सीमित था—आईटी सेवाएँ, डाटा प्रोसेसिंग, कस्टमर सपोर्ट और बैक-ऑफिस संचालन। उस समय रणनीतिक निर्णय पूरी तरह विकसित देशों में स्थित मुख्यालयों द्वारा लिए जाते थे।
दूसरे चरण में GCCs ने केवल नियमित कार्यों से आगे बढ़कर प्रक्रिया अनुकूलन (Process Optimization) की भूमिका निभानी शुरू की। भारतीय केंद्रों ने वित्त, विश्लेषण (Analytics) और इंजीनियरिंग सपोर्ट जैसे क्षेत्रों में योगदान देना शुरू किया। यद्यपि वे अभी भी निष्पादन-केंद्रित थे, फिर भी वे व्यापार निरंतरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन गए।
तीसरा चरण एक रणनीतिक बदलाव का प्रतीक था। लगभग 2015 के बाद, GCCs ने उत्पाद डिजाइन, नवाचार और उन्नत विश्लेषण में भागीदारी शुरू की। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारतीय टीमों पर मुख्य व्यावसायिक जिम्मेदारियाँ सौंपनी शुरू कीं।
वर्तमान चरण, जिसे GCC 4.0 कहा जाता है, एक मौलिक परिवर्तन को दर्शाता है। अब भारतीय GCC केवल सहायक इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि वे उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) बन चुके हैं। ये अब संपूर्ण उत्पाद विकास, अनुसंधान एवं विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग और बौद्धिक संपदा निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। यह चरण भारत के सेवा-आधारित अर्थव्यवस्था से ज्ञान-आधारित नवाचार अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
वैश्विक नवाचार केंद्र के रूप में भारत:
आज भारत का GCC पारिस्थितिकी तंत्र वैश्विक नवाचार संरचना का केंद्रीय स्तंभ बन चुका है। लगभग 58% GCC उन्नत तकनीकों—जैसे एजेंटिक AI, स्वायत्त प्रणालियाँ, क्वांटम कंप्यूटिंग, क्लाउड आर्किटेक्चर और साइबर सुरक्षा—में सक्रिय निवेश कर रहे हैं।
ये केंद्र अब केवल निर्देशों का पालन नहीं कर रहे, बल्कि अपनी मूल कंपनियों की तकनीकी रणनीति और भविष्य की दिशा तय कर रहे हैं। भारत की विशाल, युवा और तकनीकी रूप से दक्ष जनशक्ति इसे वैश्विक स्तर पर विशिष्ट बनाती है।
“फॉलो-द-सन” मॉडल के माध्यम से, जहाँ विभिन्न समय क्षेत्रों में लगातार काम होता है, उत्पाद विकास की गति अत्यंत तेज हो गई है। भारतीय GCCs वित्त, कानूनी अनुपालन, डेटा विज्ञान और जोखिम प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र बन चुके हैं।
महत्वपूर्ण यह है कि भारत की भूमिका अब केवल तकनीकी नहीं रही। GCCs अब कॉर्पोरेट गवर्नेंस, रणनीतिक योजना और वैश्विक संचालन प्रबंधन में भी सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं, जो भारतीय बौद्धिक क्षमता में वैश्विक विश्वास को दर्शाता है।
GCC विस्तार का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव:
GCCs के विस्तार ने भारत की अर्थव्यवस्था और समाज पर गहरा प्रभाव डाला है। सबसे बड़ा लाभ उच्च गुणवत्ता वाले रोजगारों का सृजन रहा है। ये नौकरियाँ बेहतर वेतन, करियर में तेजी और अत्याधुनिक तकनीकों के संपर्क का अवसर प्रदान करती हैं, जिससे एक वैश्विक प्रतिस्पर्धी पेशेवर वर्ग का निर्माण हुआ है।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रभाव क्षेत्रीय विकास का विकेंद्रीकरण है। जहाँ पहले GCC मुख्यतः बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों तक सीमित थे, अब निवेश कोयंबटूर, इंदौर, कोच्चि, जयपुर और भुवनेश्वर जैसे टियर-II और टियर-III शहरों में भी हो रहा है। इससे शहरी भीड़ कम हो रही है और संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिल रहा है।
इसके अतिरिक्त, GCCs के विस्तार ने उद्योग, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित किया है। इससे तकनीकी शिक्षा की मांग बढ़ी है और उच्च शिक्षा व अनुसंधान की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
उभरती चुनौतियाँ और संरचनात्मक जोखिम:
अपनी सफलता के बावजूद, GCC-आधारित विकास मॉडल कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।
सबसे बड़ी समस्या कौशल अंतर (Skill Gap) है। यद्यपि भारत बड़ी संख्या में इंजीनियर तैयार करता है, लेकिन AI सुरक्षा, क्वांटम कंप्यूटिंग और उन्नत क्लाउड आर्किटेक्चर जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की भारी कमी है। इससे प्रतिभा के लिए तीव्र प्रतिस्पर्धा, वेतन वृद्धि और उच्च पलायन दर जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
साइबर सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता बन चुकी है। चूँकि GCCs संवेदनशील वैश्विक डेटा संभालते हैं, भारत साइबर हमलों का प्रमुख लक्ष्य बन गया है। रिपोर्टों के अनुसार, वैश्विक साइबर हमलों का एक बड़ा हिस्सा भारत से संबंधित है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act) ने अनुपालन की जिम्मेदारी और बढ़ा दी है, जिससे साइबर सुरक्षा अब केवल तकनीकी नहीं बल्कि कानूनी और प्रतिष्ठागत मुद्दा बन गई है।
कराधान और विनियामक अनिश्चितता भी एक बड़ी चुनौती है। OECD के वैश्विक न्यूनतम कर (Global Minimum Tax) ने कर लाभों को सीमित कर दिया है। वहीं, भारत का 24% सेफ हार्बर मार्कअप बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
भू-राजनीतिक तनाव, डेटा स्थानीयकरण नीतियाँ और पश्चिमी देशों की री-शोरिंग रणनीतियाँ भी भारत के GCC विस्तार को धीमा कर सकती हैं।
सरकारी पहल और नीतिगत दिशा:
GCCs के रणनीतिक महत्व को समझते हुए, भारत सरकार ने कई कदम उठाए हैं। 2025–26 के बजट में प्रस्तावित राष्ट्रीय GCC नीति ढाँचा का उद्देश्य नियमों को सरल बनाना, व्यापार सुगमता बढ़ाना और भारत को वैश्विक नवाचार केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट डेटा सुरक्षा और व्यावसायिक दक्षता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है, हालांकि इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सावधानी आवश्यक है। साथ ही, स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं को डीप-टेक आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला जा रहा है।
फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि नीतिगत घोषणाओं के साथ-साथ तेज़ क्रियान्वयन और मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय अनिवार्य है।
आगे की राह: सतत GCC विकास की दिशा में:
भारत को विश्व की नवाचार राजधानी बनाए रखने के लिए एक दूरदर्शी और सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। GCCs के लिए एक समर्पित सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम स्थापित करना आवश्यक है, जिससे कर, श्रम कानून, डेटा अनुपालन और अवसंरचना से जुड़े अनुमोदन सरल हो सकें।
उद्योग और शिक्षा जगत के बीच सहयोग को मजबूत करना भी अत्यंत आवश्यक है। विश्वविद्यालयों को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे, जबकि कंपनियों को प्रशिक्षण, इंटर्नशिप और अनुसंधान में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
कर नीति में स्थिरता, ट्रांसफर प्राइसिंग नियमों का युक्तिकरण और अनुसंधान-आधारित गतिविधियों के लिए प्रोत्साहन निवेशकों का विश्वास बढ़ाएंगे।
अंततः, साइबर सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। साइबर लचीलापन, खतरा-सूचना साझाकरण और स्वदेशी सुरक्षा तकनीकों में निवेश भारत की डिजिटल संप्रभुता की रक्षा करेगा।
निष्कर्ष:
भारत का बैक-ऑफिस अर्थव्यवस्था से वैश्विक बौद्धिक केंद्र बनने का सफर उसके विकास इतिहास का एक निर्णायक अध्याय है। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स आज नवाचार, रोजगार और रणनीतिक प्रभाव के प्रमुख स्तंभ बन चुके हैं।
हालाँकि, इस गति को बनाए रखने के लिए केवल बाजार शक्तियाँ पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए दूरदर्शी नीतियाँ, संस्थागत सुधार और मानव संसाधन में सतत निवेश अनिवार्य है। यदि भारत कौशल, साइबर सुरक्षा, कर व्यवस्था और भू-राजनीतिक चुनौतियों का प्रभावी समाधान कर लेता है, तो वह न केवल वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनेगा, बल्कि उसका नेतृत्व भी करेगा।
GCC क्रांति, यदि सही दिशा में पोषित की जाए, तो आने वाले दशकों में भारत की आर्थिक शक्ति का सबसे मजबूत स्तंभ सिद्ध हो सकती है।
एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस
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