बजटीय मामलों में भारत की संसद हाशिए पर:

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द हिंदू संपादकीय: 22 मार्च 2025 को प्रकाशित:

 

चर्चा में क्यों ?

भारत में बजट प्रक्रिया को लेकर बहस तेज़ हो गई है, क्योंकि संसद की वित्तीय नीतियों पर सीमित भूमिका को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। सरकार द्वारा संचालित बजट प्रणाली में सांसदों को प्रभावी वित्तीय नीति निर्माण और निरीक्षण का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। इस संदर्भ में पूर्व-बजट चर्चा और संसदीय बजट कार्यालय (PBO) की स्थापना की माँग बढ़ रही है, जिससे बजट प्रक्रिया में पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और लोकतांत्रिक जवाबदेही को बढ़ावा मिल सके।

 

भारत की बजट प्रक्रिया में मुख्य समस्याएँ-

1️. कार्यपालिका का एकाधिकार:

वित्त मंत्रालय स्वतंत्र रूप से बजट तैयार करता है, और संसद की भूमिका मात्र स्वीकृति तक सीमित रहती है।

यहाँ तक कि कैबिनेट मंत्रियों को भी बजट पेश होने से पहले इसकी पूरी जानकारी नहीं होती।

2️. राज्यसभा की सीमित भूमिका:

ऊपरी सदन को बजट चर्चा में कोई प्रभावशाली भूमिका नहीं दी गई है।

राज्यसभा से चुने गए वित्त मंत्री अपने ही बजट प्रस्तावों पर लोकसभा में मतदान नहीं कर सकते, जिससे यह एक विरोधाभासी स्थिति बन जाती है।

3️. बहस और निगरानी की कमी:

बजट पर संसदीय बहस अक्सर संक्षिप्त और प्रभावहीन होती है।

संसदीय समितियों को बजट संशोधन या आवंटन बदलने का अधिकार नहीं दिया गया है।

 

वैश्विक तुलना: अन्य लोकतंत्रों में बजट प्रक्रिया-

ब्रिटेन: ब्रिटिश संसद, जिसमें असंबंधित हाउस ऑफ लॉर्ड्स भी शामिल है, बजटीय कानूनों पर कुछ प्रभाव डालता है।

अमेरिका: वहाँ Congressional Budget Office (CBO) स्वतंत्र रूप से बजट विश्लेषण और नीति प्रभाव का आकलन करता है।

कनाडा और ऑस्ट्रेलिया: इन देशों में स्वतंत्र बजट कार्यालय हैं, जो विधायी निरीक्षण को मजबूत करते हैं।

 

बजट प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित सुधार-

1️. पूर्व-बजट चर्चा (Pre-Budget Discussions) का प्रावधान

संसद में मानसून सत्र के दौरान 5-7 दिन की पूर्व-बजट चर्चा अनिवार्य की जानी चाहिए।

सांसदों को वित्तीय रुझानों का विश्लेषण करने और सरकार को आर्थिक प्राथमिकताएँ सुझाने का अवसर मिलना चाहिए।

इससे जन भागीदारी बढ़ेगी और बजट प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी।

 

2️. संसदीय बजट कार्यालय (PBO) की स्थापना

यह कार्यालय डेटा-आधारित विश्लेषण प्रदान करेगा, ठीक वैसे ही जैसे अमेरिकी CBO।

PBO नीति प्रभाव का मूल्यांकन, राजस्व और व्यय का विश्लेषण और वित्तीय पूर्वानुमान तैयार करेगा।

इससे सांसदों को सूचित निर्णय लेने में मदद मिलेगी और सरकार को मजबूत जवाबदेही के दायरे में लाया जा सकेगा।

वित्तीय अनुशासन पर बहस: कार्यपालिका बनाम विधायिका

चिंता: कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि संसद को बजट पर अधिक शक्ति देने से जनप्रिय खर्चों (populist spending) में वृद्धि हो सकती है, जिससे वित्तीय अस्थिरता पैदा हो सकती है।

प्रति-तर्क: कार्यपालिका पर बिना जाँच-परख के पूरा भरोसा करना उचित नहीं। लोकतंत्र संतुलन और नियंत्रण (checks and balances) की प्रणाली पर आधारित है, जिससे आर्थिक न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

 

ये सुधार क्यों महत्वपूर्ण हैं?

  • बजट निर्माण में अधिक पारदर्शिता
  • सरकार की संसद के प्रति जवाबदेही बढ़ेगी
  • संतुलित और न्यायसंगत आर्थिक नीतियाँ बनेगी
  • संसद को अधिक प्रभावशाली भूमिका मिलेगी

 

निष्कर्ष: यदि संसद को पूर्व-बजट चर्चा और PBO जैसी संरचनाओं के माध्यम से सक्रिय भूमिका दी जाए, तो बजट प्रक्रिया बेहतर, लोकतांत्रिक और अधिक जवाबदेह बन सकती है। 

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