भारतीय चित्रकला और पारंपरिक कला रूप

भारतीय चित्रकला और पारंपरिक कला रूप

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भारतीय चित्रकला: पारंपरिक कला रूप

 

भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता उसकी मनमोहक लोक कलाओं और पारंपरिक चित्रकला शैलियों में जीवंत रूप से दिखाई देती है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में सदियों से अनेक विशिष्ट चित्रकला शैलियाँ विकसित हुई हैं, जो स्थानीय परंपराओं, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और पौराणिक कथाओं को दर्शाती हैं। प्रारंभ में ये कला रूप दीवारों, फर्शों और कपड़ों पर बनाए जाते थे, लेकिन समय के साथ इन्होंने कागज और कैनवास पर भी अपना स्थान बना लिया, जबकि अपनी मौलिकता और आत्मा को बनाए रखा।

ये चित्र केवल सजावटी नहीं हैं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली दृश्य कथाएँ हैं, जो भारत की कलात्मक विरासत का प्रतिनिधित्व करती हैं। नीचे भारत की कुछ प्रसिद्ध पारंपरिक लोक चित्रकला शैलियों का वर्णन किया गया है:

 

मधुबनी चित्रकला

मधुबनी चित्रकला की उत्पत्ति बिहार के मिथिला क्षेत्र में हुई और यह भारत की सबसे प्रसिद्ध लोक कला परंपराओं में से एक है। पारंपरिक रूप से यह कला घरों की मिट्टी की दीवारों और फर्शों पर बनाई जाती थी। मधुबनी चित्रों की विशेषता उनकी जटिल ज्यामितीय आकृतियाँ, पौराणिक विषय-वस्तु और प्रतीकात्मक रूपांकन हैं। इन चित्रों में लाल, पीला, नीला और हरा जैसे चमकीले और आकर्षक रंगों का प्रयोग किया जाता है, जो इन्हें अत्यंत प्रभावशाली बनाते हैं।

मधुबनी कला की पाँच प्रमुख शैलियाँ हैं—कचनी, भरनी, तांत्रिक, खोबर और गोदना। यह कला रूप हिंदू पौराणिक कथाओं, प्रकृति और सामाजिक अनुष्ठानों के दृश्यों को सुंदरता से प्रस्तुत करता है। प्रसिद्ध कलाकारों जैसे Lalita Devi और Bua Devi को इस कला में उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है।

 

वारली चित्रकला

वारली चित्रकला लगभग 2,500 वर्ष पुरानी एक जनजातीय कला शैली है, जो मुख्यतः महाराष्ट्र के ठाणे और नासिक क्षेत्रों में प्रचलित है। यह कला सरल ज्यामितीय आकृतियों—जैसे वृत्त, त्रिकोण और वर्ग—के माध्यम से बनाई जाती है। वारली चित्रों में खेती, नृत्य, शिकार और त्योहारों जैसी दैनिक जीवन की गतिविधियों को दर्शाया जाता है।

पारंपरिक रूप से यह चित्रकला मिट्टी की दीवारों पर चावल के घोल से, टहनियों की सहायता से बनाई जाती थी। अपनी सादगी और गहरे सांस्कृतिक प्रतीकवाद के कारण यह कला अत्यंत प्रशंसित है। Jivya Soma Mashe, जिन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया, ने वारली कला को जनजातीय सीमाओं से बाहर लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

कालीघाट चित्रकला

कालीघाट चित्रकला का उद्भव 19वीं शताब्दी के मध्य में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) स्थित काली मंदिर के आसपास हुआ। यह चित्रकला कागज़ पर बनाई जाती थी और इसे बनाने वाले कलाकारों को “पटुआ” कहा जाता था। इन चित्रों में पौराणिक देवताओं के साथ-साथ दैनिक जीवन के दृश्य भी दर्शाए जाते थे।

कालीघाट कला अपनी मोटी रेखाओं, प्रवाहपूर्ण ब्रश स्ट्रोक्स और भारतीय पारंपरिक रंगों—जैसे इंडिगो, गेरुआ और लाल—के प्रयोग के लिए जानी जाती है। Anwar Chitrakar इस शैली से जुड़े राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकार हैं।

 

Phad Painting (फड़ चित्रकला)

फड़ चित्रकला राजस्थान की एक पारंपरिक स्क्रॉल (पट्ट) चित्रकला शैली है। इसे लंबे क्षैतिज कपड़े पर बनाया जाता है, जिसमें स्थानीय देवताओं, वीर गाथाओं और प्रेम कथाओं का चित्रण किया जाता है।

लाल, पीले और नारंगी जैसे चमकीले रंगों का प्रयोग फड़ चित्रों को अत्यंत आकर्षक बनाता है। एक ही चित्र में कई कथाओं को कुशलता से प्रस्तुत किया जाता है। Shantilal Joshi इस कला को संरक्षित रखने के लिए प्रसिद्ध राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकार हैं।

 

Indian Miniature Painting (लघु चित्रकला)

भारतीय लघु चित्रकला का उत्कर्ष 16वीं शताब्दी में मुगल संरक्षण के दौरान हुआ। यह अत्यंत सूक्ष्म और जटिल कला शैली फारसी, इस्लामी और भारतीय तत्वों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। इसकी प्रमुख विशेषता बारीक विवरण और कोमल ब्रश कार्य है।

परंपरागत रूप से लघु चित्रों में प्राकृतिक खनिज रंगों, बहुमूल्य पत्थरों, सोने और चांदी का प्रयोग किया जाता था। भारत में इसकी विभिन्न शैलियाँ विकसित हुईं, जिनमें मुगल, कांगड़ा, राजस्थान, मालवा, पहाड़ी और दक्कन शैली प्रमुख हैं। Gopal Prasad Sharma इस कला में उत्कृष्टता के लिए जाने जाते हैं।

 

Gond Painting (गोंड चित्रकला)

गोंड चित्रकला की उत्पत्ति मध्य भारत की गोंड जनजाति से हुई है। इन चित्रों की पहचान उनके चमकीले रंगों और बिंदुओं तथा रेखाओं से बने जटिल पैटर्न से होती है।

परंपरागत रूप से रंग बनाने के लिए कोयला, पौधों का रस, मिट्टी और पत्तियों जैसे प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग किया जाता था। गोंड कला में प्रायः पशु-पक्षी, लोककथाएँ और पौराणिक कहानियाँ दर्शाई जाती हैं। Bhajju Shyam एक प्रसिद्ध राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गोंड कलाकार हैं।

 

Kerala Mural Painting (केरल भित्ति चित्रकला)

केरल की भित्ति चित्रकला शास्त्रीय दीवार चित्रों की एक प्राचीन परंपरा है, जिसकी जड़ें गहरी आध्यात्मिकता से जुड़ी हैं। ये चित्र मुख्यतः मंदिरों और महलों की दीवारों पर पाए जाते हैं। इनमें हिंदू पौराणिक कथाओं, विशेषकर कृष्ण, शिव और शक्ति से संबंधित दृश्यों का चित्रण किया जाता है।

मोटी रेखाएँ और गहरे, जीवंत रंग—जैसे गेरुआ-लाल, पीला, हरा और सफेद—इस कला की प्रमुख विशेषताएँ हैं। Achutan Ramchandran Nair को भित्ति कला में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

 

Patachitra Painting (पट्टचित्र चित्रकला)

पट्टचित्र ओडिशा की एक पारंपरिक चित्रकला शैली है। इसका विषय मुख्यतः पौराणिक और धार्मिक कथाओं पर आधारित होता है। पट्टचित्र चित्रों की विशेषता उनकी मोटी रेखाएँ, सजावटी किनारे (बॉर्डर) और लाल, पीला, सफेद तथा काले जैसे चमकीले रंग हैं।

यह कला अपनी सूक्ष्म कारीगरी और कथा-वाचन शैली के कारण विश्वभर में प्रशंसित है। Sharat Kumar Sahu इस शैली से जुड़े राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकार हैं।

 

Pichwai Painting (पिचवाई चित्रकला)

पिचवाई चित्रकला की उत्पत्ति राजस्थान के नाथद्वारा में हुई। इसे भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित मंदिरों में सजावटी पृष्ठभूमि (बैकड्रॉप) के रूप में उपयोग किया जाता था। इन चित्रों में श्रीकृष्ण के जीवन की कथाओं को दर्शाया जाता है और इनमें गहरा प्रतीकवाद तथा जटिल अलंकरण देखने को मिलता है।

चमकीले रंगों और भक्ति-भाव से ओत-प्रोत विषयवस्तु के कारण पिचवाई चित्रकला आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम मानी जाती है। Kalyan Mal Sahu को इस कला के संरक्षण में उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है।

 

Kalamkari (कलमकारी)

कलमकारी लगभग 3,000 वर्ष पुरानी भारत की एक प्राचीन पारंपरिक कला शैली है, जिसकी उत्पत्ति आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हुई। यह केवल वस्त्र सजाने की तकनीक नहीं, बल्कि रसायन विज्ञान और रचनात्मकता का अद्भुत संगम है। इस कला में 23 चरणों वाली शुद्धिकरण और रंगाई प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसे पूरा होने में कई सप्ताह लग सकते हैं। इसमें केवल प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग होता है—जैसे पीले रंग के लिए अनार के छिलके और काले रंग के लिए किण्वित लोहा। इसी कारण इसके रंग हल्के, मृदु, प्राकृतिक और अत्यंत टिकाऊ होते हैं।

 

कला के प्रमुख तत्व

  • कलम” (पेन) का उपयोग: Srikalahasti शैली में कलाकार नुकीले बांस की कलम का उपयोग करते हैं, जिसके सिरे पर महीन बाल या ऊन का छोटा गुच्छा बंधा होता है। यह रंग को संचित रखने का कार्य करता है और दबाव के अनुसार रंग का प्रवाह नियंत्रित किया जाता है।
  • दूध से उपचार (Milk Treatment): कपड़े को भैंस के दूध और हरड़ (मायरोबालान) के मिश्रण में भिगोया जाता है। यह प्रक्रिया रंगों को फैलने से रोकती है और कपड़े को हल्की क्रीमी सुगंध व बनावट प्रदान करती है।
  • नदी में धुलाई: पारंपरिक कलाकार कपड़े को बहते हुए नदी के पानी में धोना आवश्यक मानते हैं। स्थानीय नदियों—जैसे Swarnamukhi River—के खनिज तत्व प्राकृतिक रंगों को और अधिक निखारने में रासायनिक भूमिका निभाते हैं।
  • कथावाचन का माध्यम: ऐतिहासिक रूप से कलमकारी चित्रों का उपयोग घूमने वाले गायक और विद्वान रामायण और महाभारत की कथाओं को चित्रों के माध्यम से गाँवों में प्रस्तुत करने के लिए करते थे। ये बड़े स्क्रॉल चित्र एक दृश्य कथा-पट के रूप में कार्य करते थे।
  • आधुनिक समय में महत्व: सस्ती स्क्रीन-प्रिंट नकलों के बावजूद, प्रामाणिक “GI-टैग” युक्त कलमकारी आज भी उच्च फैशन में अत्यंत मूल्यवान मानी जाती है। इसे लक्ज़री साड़ियों, दुपट्टों और आधुनिक गृह सज्जा वस्तुओं में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
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