दशक बाद भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक की वापसी, पश्चिम एशिया संबंधों में रणनीतिक पुनर्संयोजन का संकेत

दशक बाद भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक की वापसी, पश्चिम एशिया संबंधों में रणनीतिक पुनर्संयोजन का संकेत

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विदेश मंत्रालय:- 29 जनवरी 2026 को प्रकाशित

 

यह चर्चा में क्यों है?

भारत 31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में दूसरी भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक (India–Arab Foreign Ministers’ Meeting – FMM) की मेजबानी कर रहा है। यह बैठक 10 वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित की जा रही है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटना बन गई है। इस बैठक की सह-अध्यक्षता भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) कर रहे हैं। इसमें अरब लीग के सदस्य देशों के विदेश मंत्री तथा अरब लीग के महासचिव भाग ले रहे हैं।
यह आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक परिदृश्य में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं। बैठक का पुनरुद्धार भारत के अरब जगत के साथ संबंधों को और गहरा करने के प्रयासों को दर्शाता है। साथ ही, यह भारत–अरब संबंधों को केवल द्विपक्षीय स्तर तक सीमित न रखकर, उन्हें संस्थागत और बहुपक्षीय सहयोग के ढांचे में विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

 

पृष्ठभूमि: भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक

भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक भारत और अरब लीग (League of Arab States) के बीच एक उच्च स्तरीय बहुपक्षीय संवाद मंच है। इसकी परिकल्पना भारत और अरब देशों के बीच राजनीतिक संवाद, रणनीतिक समन्वय और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी।

द्विपक्षीय संवादों के विपरीत, यह मंच भारत को अरब जगत के साथ एक संगठित क्षेत्रीय समूह के रूप में संवाद करने का अवसर प्रदान करता है, जिससे साझा प्राथमिकताओं और चुनौतियों पर व्यापक चर्चा संभव हो पाती है। अरब लीग के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों और महासचिव की भागीदारी इस मंच को पैन-अरब स्वरूप प्रदान करती है, जिससे यह भारत की पश्चिम एशिया नीति का एक महत्वपूर्ण उपकरण बन जाता है। इस बैठक का पुनरुद्धार भारत की उस मंशा को दर्शाता है, जिसके तहत वह अरब क्षेत्र के साथ संरचित, सतत और दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करना चाहता है।

 

सह-अध्यक्ष के रूप में UAE की भूमिका: रणनीतिक महत्व

इस बैठक की सह-अध्यक्षता में संयुक्त अरब अमीरात की भूमिका भारत–UAE के बीच गहरे होते रणनीतिक साझेदारी संबंधों को रेखांकित करती है। पिछले कुछ वर्षों में UAE पश्चिम एशिया में भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण साझेदार बनकर उभरा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, निवेश, रक्षा और प्रवासी भारतीयों के कल्याण जैसे क्षेत्रों में मजबूत सहयोग है।

बैठक में UAE की नेतृत्वकारी भूमिका यह दर्शाती है कि अरब जगत के भीतर उस पर कितना विश्वास किया जाता है और वह भारत–अरब सहयोग के सेतु के रूप में कार्य करने में सक्षम है। भारत के लिए UAE के साथ मिलकर काम करना उसकी व्यापक पश्चिम एशिया नीति के अनुरूप है, जिसमें क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए प्रमुख क्षेत्रीय साझेदारों के साथ सहयोग पर जोर दिया गया है। UAE की सह-अध्यक्षता इस मंच की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को भी मजबूत करती है।

 

10 वर्षों के अंतराल का महत्व

दूसरी भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक 2016 में बहरीन में आयोजित पहली बैठक के दस वर्ष बाद हो रही है। उस पहली बैठक में भारत और अरब देशों ने सहयोग के लिए पांच प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की थी—अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति।

हालांकि, क्षेत्रीय अस्थिरता, पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों और कोविड-19 महामारी जैसी वैश्विक आपदाओं के कारण इस प्रक्रिया में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी। इसके अतिरिक्त, बदलती कूटनीतिक प्राथमिकताओं और आर्थिक अनिश्चितताओं ने भी इस अंतराल को लंबा किया। 2026 में बैठक का पुनरुद्धार भारत और अरब देशों की ओर से नवीन राजनीतिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह बदलती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का भी संकेत है, जहां भारत की बढ़ती आर्थिक और कूटनीतिक क्षमता तथा अरब देशों की आर्थिक विविधीकरण की रणनीतियां एक-दूसरे के पूरक बनती जा रही हैं।

 

दूसरी बैठक के प्रमुख एजेंडा क्षेत्र

दूसरी FMM बैठक में पहले से निर्धारित पांच प्राथमिक क्षेत्रों पर आगे बढ़ते हुए व्यावहारिक और परिणामोन्मुखी सहयोग पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। आर्थिक सहयोग के तहत व्यापार विस्तार, निवेश को प्रोत्साहन और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती पर चर्चा होगी।

ऊर्जा क्षेत्र में पारंपरिक तेल और गैस के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन जैसे उभरते क्षेत्रों पर भी विचार किया जाएगा, जो वैश्विक ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों के अनुरूप है। शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में छात्र आदान-प्रदान, शैक्षणिक सहयोग और सांस्कृतिक पहल के माध्यम से जन-जन के बीच संपर्क को मजबूत करने पर जोर रहेगा। मीडिया सहयोग के तहत सूचना आदान-प्रदान और गलत सूचना (मिसइन्फॉर्मेशन) से निपटने जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे। ये सभी क्षेत्र यह दर्शाते हैं कि भारत–अरब सहयोग अब प्रतीकात्मक कूटनीति से आगे बढ़कर व्यावहारिक साझेदारी की ओर अग्रसर हो रहा है।

 

अरब जगत से व्यापक भागीदारी

इस बैठक में सोमालिया, फिलिस्तीन, कोमोरोस और सूडान जैसे देशों के विदेश मंत्रियों के साथ-साथ अरब लीग के महासचिव भी भाग ले रहे हैं। यह व्यापक भागीदारी इस मंच के पैन-अरब स्वरूप को रेखांकित करती है।
Gulf देशों, उत्तरी अफ्रीका और हॉर्न ऑफ अफ्रीका के देशों को एक ही कूटनीतिक ढांचे के तहत जोड़कर भारत स्वयं को एक तटस्थ, संतुलित और समावेशी साझेदार के रूप में स्थापित करता है। इस प्रकार की भागीदारी FMM की वैधता और प्रभाव को बढ़ाती है और इसे क्षेत्रीय संवाद एवं सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच बनाती है।

 

भारत के लिए रणनीतिक महत्व

भारत–अरब FMM का पुनरुद्धार भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अरब क्षेत्र के साथ मजबूत संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करते हैं, क्योंकि यह क्षेत्र तेल और गैस का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। इसके अतिरिक्त, यह मंच व्यापार और निवेश के नए अवसर खोलता है, विशेष रूप से अवसंरचना, प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में।

कूटनीतिक रूप से, यह बैठक पश्चिम एशिया में भारत की एक प्रमुख हितधारक के रूप में भूमिका को मजबूत करती है और उसकी मल्टी-अलाइनमेंट तथा ग्लोबल साउथ रणनीति को पूरक बनाती है। शिक्षा, संस्कृति और मीडिया पर दिया गया जोर यह सुनिश्चित करता है कि सहयोग केवल सरकारों तक सीमित न रहकर समाजों के स्तर तक विस्तारित हो।

 

निष्कर्ष

दूसरी भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक भारत की पश्चिम एशिया कूटनीति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। एक दशक के अंतराल के बाद इस मंच का पुनरुद्धार भारत और अरब जगत के बीच साझा हितों और उभरते अवसरों की सामूहिक पहचान को दर्शाता है।

आर्थिक, ऊर्जा, शिक्षा, संस्कृति और मीडिया जैसे क्षेत्रों में संवाद को संस्थागत रूप देकर यह मंच भारत–अरब संबंधों को संरचित, व्यापक और भविष्य-उन्मुख साझेदारी में परिवर्तित करने का प्रयास करता है। UAE की सह-अध्यक्षता और अरब क्षेत्र से व्यापक भागीदारी इस मंच की प्रासंगिकता को और मजबूत करती है। बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य में, भारत–अरब FMM आने वाले वर्षों में गहरे, टिकाऊ और पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंधों को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

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