द हिंदू: 9 जनवरी 2026 को प्रकाशित:
समाचार में क्यों?
यह मुद्दा इसलिए चर्चा में है क्योंकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट वर्ष 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियाँ अधिनियम (IEEPA) के तहत पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए वैश्विक शुल्कों (टैरिफ) की वैधता पर एक महत्वपूर्ण फैसला देने के करीब है। चीन और अन्य कई व्यापारिक साझेदारों से होने वाले आयात पर लगाए गए इन शुल्कों से लगभग 150 अरब डॉलर का राजस्व प्राप्त हुआ। यदि सुप्रीम कोर्ट यह निर्णय देता है कि ट्रंप ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर ये शुल्क लगाए थे, तो आयातक पहले से चुकाए गए शुल्कों की वापसी (रिफंड) की मांग कर सकते हैं। इससे अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा टैरिफ रिफंड विवाद खड़ा हो सकता है। यह फैसला व्यापार शासन, कार्यपालिका की शक्ति और राजकोषीय प्रबंधन पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला माना जा रहा है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ:
अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियाँ अधिनियम (IEEPA) को वर्ष 1977 में लागू किया गया था ताकि अमेरिकी राष्ट्रपति असाधारण विदेशी खतरों से निपटने के लिए प्रतिबंध लगाने, संपत्तियाँ फ्रीज करने या वित्तीय लेन-देन को सीमित करने जैसे कदम उठा सकें। ऐतिहासिक रूप से, इस कानून का उपयोग मुख्यतः शत्रुतापूर्ण देशों, आतंकवादी संगठनों या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले व्यक्तियों को निशाना बनाने के लिए किया गया है।
हालाँकि, डोनाल्ड ट्रंप IEEPA का उपयोग कर टैरिफ लगाने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने, जो स्थापित परंपराओं से एक बड़ा विचलन था। उन्होंने इन शुल्कों को बड़े व्यापार घाटों तथा फेंटानिल और अन्य अवैध मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़ी राष्ट्रीय आपात स्थितियों का हवाला देकर उचित ठहराया, विशेष रूप से चीन, कनाडा और मेक्सिको के संदर्भ में। इसी आधार पर ट्रंप ने अधिकांश अमेरिकी व्यापारिक साझेदारों से आयात पर तथाकथित “पारस्परिक (रेसिप्रोकल) शुल्क” लगाने की घोषणा की।
फरवरी से दिसंबर के बीच इन शुल्कों से 133.5 अरब डॉलर से अधिक की वसूली हुई और अनुमान है कि यह राशि बढ़कर लगभग 150 अरब डॉलर तक पहुँच गई। आयातकों ने इन कदमों को अदालत में चुनौती दी और तर्क दिया कि टैरिफ तय करने का अधिकार कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास, और IEEPA स्पष्ट रूप से सीमा शुल्क लगाने की अनुमति नहीं देता।
प्रमुख कानूनी और संवैधानिक मुद्दे:
इस मामले के केंद्र में शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) से जुड़ा एक मौलिक संवैधानिक प्रश्न है। अमेरिकी संविधान व्यापार को नियंत्रित करने और टैरिफ लगाने का अधिकार कांग्रेस को देता है, जबकि कार्यपालिका से अपेक्षा की जाती है कि वह कानूनों को सीमित दायरे में लागू करे। आलोचकों का कहना है कि ट्रंप द्वारा IEEPA का उपयोग कार्यपालिका की अतिरेक (Executive Overreach) का उदाहरण है, जिसमें एक आपातकालीन कानून को उसके मूल उद्देश्य से आगे बढ़ाकर इस्तेमाल किया गया।
मौखिक बहस के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के रूढ़िवादी और उदारवादी दोनों तरह के न्यायाधीशों ने इस बात पर संदेह व्यक्त किया कि क्या IEEPA वास्तव में टैरिफ लगाने का वैधानिक अधिकार देता है। इस द्विदलीय चिंता के कारण यह संभावना बढ़ गई है कि अदालत इन शुल्कों को निरस्त कर सकती है, जिससे घोषित राष्ट्रीय आपात स्थितियों के दौरान राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमाओं को नए सिरे से परिभाषित किया जा सकता है।
रिफंड की दुविधा: प्रशासनिक और कानूनी जटिलता:
भले ही सुप्रीम कोर्ट टैरिफ को अवैध ठहरा दे, रिफंड की प्रक्रिया सरल नहीं होगी। परंपरागत रूप से, अमेरिकी सीमा शुल्क और सीमा सुरक्षा एजेंसी (CBP) के तहत आयातकों को शुल्क को चुनौती देने के लिए 314 दिनों की अवधि मिलती है। इसके बाद आयात “लिक्विडेट” हो जाता है और रिफंड की अनुमति नहीं होती। चीन से संबंधित कई आयातों के लिए यह समय-सीमा पहले ही समाप्त हो चुकी है।
इससे एक विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न होती है—टैरिफ को अवैध घोषित किया जा सकता है, लेकिन रिफंड की गारंटी नहीं होगी। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट रूप से रिफंड का आदेश नहीं देता, तो मामला कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड को भेजा जा सकता है, जिससे लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो जाएगी। ऐसी स्थिति में आयातकों को स्वतः प्रशासनिक प्रक्रिया के बजाय अलग-अलग मुकदमों के माध्यम से राहत तलाशनी पड़ सकती है।
सरकार का रुख और राजनीतिक प्रतिरोध:
कई उद्योग जगत के नेताओं का मानना है कि राजनीतिक प्रतिरोध किसी भी रिफंड प्रयास को जटिल बना देगा। पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप और उनके प्रमुख सहयोगियों ने संकेत दिया है कि वे एकत्र किए गए राजस्व को लौटाने के पक्ष में नहीं हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने सार्वजनिक रूप से भरोसा जताया है कि सुप्रीम कोर्ट टैरिफ को बरकरार रखेगा। वहीं, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने कहा है कि यदि राजस्व में कमी आती भी है, तो सरकार अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत नए टैरिफ लगा सकती है।
यह रुख इस आशंका को और मजबूत करता है कि कार्यपालिका किसी न किसी तरीके से टैरिफ राजस्व बनाए रखने की कोशिश करेगी, जिससे व्यवसायों के लिए अनिश्चितता और लंबी खिंच सकती है।
व्यवसायों और बाजारों पर प्रभाव:
इस अनिश्चितता का आयातकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। कॉस्टको, रेव्लॉन, बम्बल बी फूड्स, एसिलर लक्सोटिका, कावासाकी मोटर्स और योकोहामा टायर जैसी कंपनियों ने अपने संभावित रिफंड अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए पूर्व-निवारक मुकदमे दायर किए हैं। इन कंपनियों का तर्क है कि न्यायिक हस्तक्षेप के बिना अवैध रूप से वसूले गए टैरिफ कभी वापस नहीं मिलेंगे।
छोटी कंपनियाँ, जिनके पास लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के संसाधन नहीं हैं, अपने संभावित रिफंड दावों को हेज फंड्स को भारी छूट पर बेच रही हैं। इससे टैरिफ रिफंड अधिकारों के लिए एक द्वितीयक बाजार उभर आया है, जो रिफंड प्रक्रिया में गहरे अविश्वास और अनिश्चितता को दर्शाता है।
प्रशासनिक तैयारी और हालिया घटनाक्रम:
एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, अमेरिकी सीमा शुल्क और सीमा सुरक्षा एजेंसी (CBP) ने घोषणा की है कि 6 फरवरी से सभी टैरिफ रिफंड इलेक्ट्रॉनिक रूप से ACE पोर्टल के माध्यम से संसाधित किए जाएंगे और कागजी चेक प्रणाली समाप्त कर दी जाएगी। हालाँकि यह कदम पूर्णतः स्वचालित रिफंड व्यवस्था नहीं है, फिर भी इसे बड़े पैमाने पर रिफंड की संभावना के लिए प्रशासनिक तैयारी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
फिर भी, संभावित रिफंड का पैमाना CBP के लिए अभूतपूर्व रहेगा। यद्यपि अमेरिकी ट्रेजरी नियमित रूप से बड़े कर रिफंड संभालती है, लेकिन टैरिफ रिफंड में जटिल आपूर्ति शृंखलाएँ, मूल्यांकन विवाद और कई मध्यस्थ शामिल होते हैं, जिससे इसका कार्यान्वयन अधिक कठिन हो जाता है।
आर्थिक और व्यापारिक प्रभाव:
राजकोषीय दृष्टि से, 150 अरब डॉलर की रिफंड जिम्मेदारी अल्पकाल में बजट पर दबाव डाल सकती है, विशेषकर यदि यह राशि पहले ही खर्च के लिए आवंटित की जा चुकी हो। व्यापारिक दृष्टि से, यह फैसला यह तय कर सकता है कि अमेरिका आर्थिक नीति में आपातकालीन शक्तियों का उपयोग किस प्रकार करता है और भविष्य के राष्ट्रपतियों की एकतरफा टैरिफ लगाने की क्षमता सीमित हो सकती है।
इस मामले के वैश्विक निहितार्थ भी हैं। ट्रंप के टैरिफ के खिलाफ फैसला आने से व्यापारिक साझेदारों को अमेरिकी व्यापार नीति की पूर्वानुमेयता पर भरोसा मिल सकता है, जबकि इसके विपरीत फैसला भविष्य के राष्ट्रपतियों को आपातकालीन कानूनों का अधिक आक्रामक उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।
आगे की राह और संभावित परिणाम
यदि सुप्रीम कोर्ट:
टैरिफ को रद्द करता है और रिफंड का आदेश देता है, तो अमेरिकी सरकार को अभूतपूर्व स्तर की रिफंड प्रणाली शीघ्र लागू करनी होगी।
टैरिफ को रद्द करता है लेकिन रिफंड पर निर्णय टाल देता है, तो आयातकों को निचली अदालतों में वर्षों तक मुकदमेबाजी का सामना करना पड़ सकता है।
टैरिफ को बरकरार रखता है, तो इससे व्यापार मामलों में कार्यपालिका की शक्ति काफी बढ़ जाएगी और रिफंड की संभावना समाप्त हो जाएगी।
हर स्थिति में, यह फैसला आर्थिक शासन और संवैधानिक सीमाओं के संतुलन के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करेगा।