द हिंदू: 27 जनवरी 2026 को प्रकाशित:
यह समाचार क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मुद्दा तब चर्चा में आया जब डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने की अपनी विवादास्पद मांग को फिर से दोहराया। ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है, जो नाटो (NATO) का सदस्य भी है। अपने पहले कार्यकाल के विपरीत, जब यूरोपीय नेताओं ने उनके बयानों को शांत करने या नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की थी, इस बार उन्होंने अभूतपूर्व एकजुटता और दृढ़ता के साथ प्रतिक्रिया दी।
यह मामला उस समय वैश्विक चर्चा का विषय बना जब दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) के दौरान यूरोपीय नेताओं ने खुलकर ट्रंप की धमकियों को खारिज किया और दबाव की राजनीति के खिलाफ चेतावनी दी। इस पूरे घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बनाने वाली बात केवल ग्रीनलैंड नहीं है, बल्कि वह सामूहिक यूरोपीय प्रतिरोध है जो इसके परिणामस्वरूप सामने आया। यह एक दुर्लभ अवसर था जब यूरोप ने अपनी पारंपरिक कूटनीतिक सावधानी को त्यागते हुए अमेरिकी दबाव का खुलकर सामना किया।
पृष्ठभूमि: ट्रंप, ग्रीनलैंड और रणनीतिक महत्वाकांक्षाएँ:
ग्रीनलैंड का सामरिक महत्व अत्यधिक है। यह आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, जहाँ विशाल खनिज संसाधन उपलब्ध हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण नए समुद्री मार्ग उभर रहे हैं। इसके अलावा, वहाँ अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी मौजूद हैं, जिससे यह भू-राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बन जाता है।
अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार प्रस्तुत किया था, जिसे अव्यावहारिक बताकर खारिज कर दिया गया था। लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने इस प्रस्ताव को और अधिक आक्रामक रूप में दोहराया और दावा किया कि वैश्विक सुरक्षा के लिए अमेरिका का ग्रीनलैंड पर नियंत्रण आवश्यक है। उन्होंने इस कदम का विरोध करने वाले देशों के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध, व्यापार शुल्क और कूटनीतिक अलगाव की धमकी भी दी।
यह दृष्टिकोण ट्रंप की व्यापक सोच को दर्शाता है, जिसमें कूटनीति को नियमों पर आधारित प्रक्रिया के बजाय लेन-देन की तरह देखा जाता है। उनके बयान अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक मानदंडों को खुली चुनौती देते हैं, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की नींव हिलती है।
यूरोप का रुख: समझौते से प्रतिरोध तक:
ट्रंप की सत्ता में वापसी के बाद लगभग एक वर्ष तक यूरोपीय देशों ने उनके साथ संबंधों को संभालकर चलाने की कोशिश की। उन्होंने टकराव से बचते हुए संवाद, प्रशंसा और बातचीत के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित करने की नीति अपनाई। यह वही रणनीति थी जो ट्रंप के पहले कार्यकाल में अपनाई गई थी।
लेकिन ग्रीनलैंड का मामला एक “रेड लाइन” साबित हुआ। किसी एक नाटो सदस्य द्वारा दूसरे सदस्य के क्षेत्र पर दावा करना गठबंधन की बुनियादी भावना के विरुद्ध था। इसे केवल कूटनीतिक दबाव नहीं, बल्कि संप्रभुता पर सीधा हमला माना गया।
इसके बाद यूरोप की सामूहिक प्रतिक्रिया सामने आई—
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि ब्रिटेन ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं करेगा।
डेनमार्क ने अमेरिकी नियंत्रण के किसी भी सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया।
नॉर्वे और अन्य यूरोपीय देशों ने कहा कि सहयोगियों के बीच धमकियों का कोई स्थान नहीं है।
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा—“अब बहुत हो गया”, और किसी भी प्रकार के विलय को नकार दिया।
कई वर्षों बाद पहली बार यूरोप एक स्वर में बोला और यह संकेत दिया कि अब तुष्टिकरण की नीति स्वीकार्य नहीं है।
यूरोप को ‘ना’ कहने का आत्मविश्वास कैसे मिला?
इसके पीछे कई कारण थे।
पहला, अमेरिका में ट्रंप की घरेलू स्थिति कमजोर होती दिख रही थी। उनकी लोकप्रियता घट रही थी, शेयर बाजार दबाव में था और संसदीय चुनाव नज़दीक थे, जिससे उनकी bargaining power कम हो गई थी।
दूसरा, यूरोप यह समझ चुका था कि ट्रंप को खुश करने की नीति कारगर नहीं है। अतीत में किए गए समझौतों से उनकी माँगें और बढ़ीं, कम नहीं हुईं।
तीसरा, यूरोप के भीतर एकता मजबूत हुई। नेताओं को एहसास हुआ कि विभाजन केवल बाहरी दबाव को बढ़ाता है।
अंततः, ग्रीनलैंड पर कब्जे जैसी मांग इतनी अतिवादी थी कि उस पर चुप्पी साधना यूरोप की वैश्विक साख को नुकसान पहुँचा सकता था।
नाटो और ट्रांस-अटलांटिक संबंधों पर प्रभाव:
ग्रीनलैंड विवाद ने नाटो के भीतर गहरे तनाव को उजागर कर दिया। नाटो पारस्परिक विश्वास और सामूहिक सुरक्षा पर आधारित संगठन है, लेकिन ट्रंप का रुख इन सिद्धांतों के विपरीत था।
डेनमार्क ने स्पष्ट किया कि यदि ग्रीनलैंड पर कब्जे का प्रयास किया गया तो यह नाटो की विश्वसनीयता को समाप्त कर देगा। यदि एक सदस्य देश दूसरे को धमका सकता है, तो गठबंधन का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
साथ ही, यह घटना यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता की इच्छा को भी दर्शाती है — यानी अमेरिका पर पूर्ण निर्भरता के बिना अपने हितों की रक्षा करने की क्षमता। यद्यपि यूरोप नाटो से अलग नहीं होना चाहता, लेकिन वह अब बिना जवाबदेही के अमेरिकी वर्चस्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
ट्रंप की कूटनीति बनाम यूरोप की नियम-आधारित व्यवस्था:
इस पूरे घटनाक्रम का केंद्रीय विषय दो भिन्न दृष्टिकोणों का टकराव है:
ट्रंप का दृष्टिकोण — शक्ति आधारित, लेन-देन पर आधारित, अंतरराष्ट्रीय कानून से बेपरवाह, और अल्पकालिक लाभ पर केंद्रित।
यूरोप का दृष्टिकोण — नियमों पर आधारित व्यवस्था, बहुपक्षीय सहयोग, संप्रभुता का सम्मान और संस्थागत कूटनीति।
ट्रंप का यह कहना कि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कानून की आवश्यकता नहीं है, यूरोपीय नेताओं के लिए चौंकाने वाला था, क्योंकि उनकी राजनीति कानून और संस्थानों पर आधारित है। यही मूलभूत अंतर समझौते को कठिन बनाता है।
वैश्विक प्रभाव:
यह घटना केवल यूरोप और अमेरिका तक सीमित नहीं है।
वैश्विक स्तर पर यह संकेत देती है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था कमजोर हो रही है।
छोटे देशों के लिए यह चिंता का विषय है कि शक्तिशाली राष्ट्र अब कानून की बजाय दबाव का सहारा ले सकते हैं।
उभरती शक्तियों के लिए यह यूरोप के एक नए, अधिक आत्मनिर्भर और राजनीतिक रूप से सक्रिय स्वरूप का संकेत है।
निष्कर्ष:
ग्रीनलैंड को लेकर हुआ यह टकराव केवल एक कूटनीतिक विवाद नहीं, बल्कि ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में एक निर्णायक मोड़ है। यूरोप का खुलकर विरोध करना इस बात का संकेत है कि अब वह शक्ति की राजनीति का सामना एकजुट होकर करेगा।
सामूहिक रूप से “ना” कहकर यूरोप ने यह दिखा दिया कि चाहे नेता कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, साझा संकल्प के सामने उसकी सीमाएँ होती हैं। यह घटना भविष्य की वैश्विक कूटनीति को दिशा देने वाली साबित हो सकती है, जहाँ तुष्टिकरण की जगह आत्मसम्मान, संप्रभुता और नियम-आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाएगी।
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