विदेशियों को मतदाता सूची से हटाना हमारा कर्तव्य है: निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा

विदेशियों को मतदाता सूची से हटाना हमारा कर्तव्य है: निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा

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द हिंदू प्रकाशित: 7 जनवरी 2026

 

क्यों चर्चा में है?

निर्वाचन आयोग (ECI) ने 6 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision–SIR) का बचाव करते हुए कहा कि मतदाता सूची में केवल भारतीय नागरिकों का होना एक संवैधानिक दायित्व है, न कि मात्र प्रशासनिक निर्णय। आयोग ने इस आरोप को खारिज किया कि यह प्रक्रिया किसी “समानांतर NRC” के समान है और कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है।

यह मामला मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष है, जिसमें बिहार और 12 अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में SIR को चुनौती दी गई है। वर्ष 2025 में बिहार से शुरू हुआ यह अभियान अब 13 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तारित हो चुका है। इसके तहत बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं— उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़ और बिहार (फेज-1) में लगभग 6.5 लाख। याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से प्रवासी मजदूरों और कमजोर वर्गों के संभावित बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित होने की आशंका जताई है, जिससे 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद न्यायिक जांच तेज हुई है।

 

निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व

ECI की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि मतदाता सूची से विदेशियों को हटाना आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक भी विदेशी मतदाता की मौजूदगी संवैधानिक लोकतंत्र को कमजोर करती है।

आयोग ने अनुच्छेद 324 (चुनावों का पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण) और अनुच्छेद 326 (केवल 18 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को मताधिकार) का हवाला दिया। तर्क यह था कि भारतीय संविधान मूलतः नागरिक-केंद्रित है, क्योंकि राष्ट्रपति, सांसद और न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पद केवल नागरिकों के लिए ही आरक्षित हैं।

 

SIR और NRC: अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएँ

निर्वाचन आयोग ने SIR की तुलना NRC से किए जाने को सिरे से खारिज किया। आयोग के अनुसार, NRC एक व्यापक नागरिकता रजिस्टर है, जिसे केंद्र सरकार नागरिकता अधिनियम के तहत संचालित करती है, जबकि मतदाता सूची केवल योग्य मतदाताओं तक सीमित होती है और यह पूरी तरह ECI के संवैधानिक क्षेत्राधिकार में आती है।

NRC के विपरीत, SIR में नाबालिगों और मानसिक रूप से असमर्थ व्यक्तियों को स्वतः बाहर रखा जाता है। इसका उद्देश्य नागरिकता तय करना नहीं, बल्कि सटीक और शुद्ध मतदाता सूची तैयार करना है। आयोग ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 327 के तहत संसद की विधायी शक्ति, अनुच्छेद 324 और 326 के अधीन है।

 

नागरिकता सत्यापन और कानूनी अधिकार

ECI ने स्पष्ट किया कि वह किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित नहीं करता। उसका दायित्व केवल मतदाता बनने की पात्रता की जांच तक सीमित है, जिसमें नागरिकता का सत्यापन आवश्यक होता है। यद्यपि नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 9(2) के तहत विदेशी नागरिकता से जुड़े मामलों का निर्णय केंद्र सरकार करती है, फिर भी मतदाता सूची के संदर्भ में नागरिकता की जांच ECI कर सकता है।

आयोग ने संविधान सभा की बहसों का हवाला देते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद से ही नागरिकता, भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रही है।

 

प्रक्रिया, सुरक्षा उपाय और चिंताएँ

SIR प्रक्रिया के तहत मतदाताओं से स्व-प्रमाणन, जन्म प्रमाण-पत्र या माता-पिता की नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ मांगे जाते हैं तथा बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) द्वारा फील्ड सत्यापन किया जाता है। जिनके नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए जाते हैं, वे फॉर्म-6 (नाम जोड़ने) और फॉर्म-7 (आपत्ति/हटाने) के माध्यम से तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अपील कर सकते हैं।

आलोचकों ने प्रशासनिक त्रुटियों, आधार के दुरुपयोग और दस्तावेज़ों के अभाव में प्रवासी व शहरी गरीबों के बाहर हो जाने की आशंका जताई है। ECI ने दोहराया है कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है और मनमाने निष्कासन को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।

 

व्यापक प्रभाव

यदि सुप्रीम कोर्ट ECI के पक्ष को स्वीकार करता है, तो इससे निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता मजबूत होगी और मतदाता सूची की शुद्धता के सिद्धांत को बल मिलेगा। यह “वन नेशन, वन इलेक्शन” जैसी व्यापक चुनावी सुधार चर्चाओं को भी संस्थागत समर्थन दे सकता है।

दूसरी ओर, बिना पर्याप्त संतुलन के बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से समावेशी लोकतंत्र को नुकसान पहुंचने का खतरा है, विशेषकर अधिक प्रवासन वाले राज्यों में। यह मामला संप्रभुता और मताधिकार के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न बन गया है।

 

आगे की राह (Way Forward)

चुनावी शुचिता और लोकतांत्रिक समावेशन के बीच संतुलन आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रीय स्तर पर एकरूप दिशानिर्देश तय कर सकता है, जिनमें पारदर्शिता, पर्याप्त नोटिस और युक्तिसंगत प्रमाण मानक शामिल हों। शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना, मतदाताओं में जागरूकता बढ़ाना और तकनीक का उपयोग करते हुए भी उचित प्रक्रिया (Due Process) बनाए रखना गलत निष्कासन को कम कर सकता है।

अंततः, लोकतंत्र की रक्षा के लिए स्वच्छ मतदाता सूचियों के साथ-साथ वास्तविक नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है, और इस मामले का निर्णय भारत में चुनावी प्रशासन की भविष्य दिशा तय करेगा।

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