द हिंदू: 8 नवंबर 2025 को प्रकाशित।
खबर में क्यों है?
भारत का खाद्य और पोषण तंत्र अब एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। अब ध्यान केवल “सबके लिए भोजन” (Food Security) से हटकर “पोषक भोजन” (Nutritional Security) पर केंद्रित हो रहा है।
स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और जैव-प्रौद्योगिकी आधारित खाद्य पदार्थों — जैसे फंक्शनल फूड्स और स्मार्ट प्रोटीन — के उभरते क्षेत्र ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है।
भारत सरकार के जैव-प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) ने इस दिशा में अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं ताकि भारत में पोषण सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा दोनों को सुदृढ़ किया जा सके।
पृष्ठभूमि:
लंबे समय तक भारत की प्राथमिकता भूख से लड़ना और खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित करना रही है, जैसे कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से।
लेकिन आज भी कुपोषण और प्रोटीन की कमी व्यापक रूप से मौजूद है — भारत के एक-तिहाई से अधिक बच्चे ठिगने (stunted) हैं।
अब जब देश की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली बदल रही है, तो लोगों की अपेक्षा है कि भोजन केवल पेट भरे नहीं बल्कि स्वास्थ्यवर्धक भी हो।
इसलिए फंक्शनल फूड्स और स्मार्ट प्रोटीन जैसे नए प्रकार के खाद्य पदार्थ इस “पोषण क्रांति” के केंद्र में हैं।
प्रमुख अवधारणाएँ:
फंक्शनल फूड्स:
फंक्शनल फूड्स ऐसे खाद्य पदार्थ होते हैं जिन्हें विटामिन, खनिज या अन्य पोषक तत्वों से समृद्ध किया जाता है ताकि वे सामान्य भोजन से अधिक स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें।
ये रोगों की रोकथाम या स्वास्थ्य सुधार में सहायक होते हैं।
उदाहरण —
विटामिन युक्त चावल,
ओमेगा-3 मिश्रित दूध,
जिंक युक्त चावल (IIRR, हैदराबाद द्वारा विकसित),
लौह (Iron) युक्त बाजरा (ICRISAT द्वारा विकसित)।
इनमें प्रयुक्त तकनीकें हैं — न्यूट्रिजेनोमिक्स (Nutrigenomics), बायो-फोर्टिफिकेशन (Bio-fortification), बायोप्रोसेसिंग (Bioprocessing) और 3D फूड प्रिंटिंग।
स्मार्ट प्रोटीन:
स्मार्ट प्रोटीन ऐसे वैकल्पिक प्रोटीन स्रोत हैं जो जैव-प्रौद्योगिकी के माध्यम से बनाए जाते हैं ताकि पशु आधारित उत्पादन पर निर्भरता कम हो।
इनके प्रमुख प्रकार हैं —
प्लांट-बेस्ड प्रोटीन (Plant-based proteins) — दालों, अनाजों या बीजों से बनाए जाते हैं जो मांस जैसी बनावट देते हैं।
फरमेंटेशन-आधारित प्रोटीन (Fermentation-derived proteins) — सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पादित।
संवर्धित मांस (Cultivated Meat) — पशु कोशिकाओं को बायोरिएक्टर में विकसित कर बिना वध के मांस तैयार करना।
ये विकल्प स्वास्थ्यवर्धक, पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ प्रोटीन स्रोत प्रदान करते हैं।
भारत को इनकी आवश्यकता क्यों है?
भारत की पोषण स्थिति आज भी असमान है।
ग्रामीण क्षेत्रों में प्रोटीन की कमी है जबकि शहरी उपभोक्ता अब ऐसे भोजन की तलाश में हैं जो स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता और ऊर्जा को बढ़ाए।
इसके साथ ही पारंपरिक कृषि और पशुपालन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जल की कमी, और भूमि क्षरण जैसी पर्यावरणीय समस्याओं को बढ़ा रहे हैं।
इसलिए भारत को ऐसे खाद्य प्रणालियों की आवश्यकता है जो पोषक तत्वों से भरपूर, पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ हों।
अब समय है कि भारत केवल “भोजन सुरक्षा” से आगे बढ़कर “पोषण सुरक्षा” को अपनी प्राथमिकता बनाए।
भारत की वर्तमान स्थिति:
भारत ने बायोटेक्नोलॉजी फॉर इकॉनमी, एनवायरनमेंट एंड एम्प्लॉयमेंट (BioE3) नीति के अंतर्गत फंक्शनल फूड्स और स्मार्ट प्रोटीन को औपचारिक रूप से मान्यता दी है।
DBT और BIRAC ने इन क्षेत्रों में अनुसंधान के लिए वित्तीय सहायता शुरू की है।
निजी क्षेत्र में टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, आईटीसी, और मैरिको जैसी कंपनियाँ स्वास्थ्य-उन्मुख खाद्य उत्पाद लॉन्च कर रही हैं।
GoodDot, Blue Tribe Foods, और Evo Foods जैसे स्टार्टअप पौधों पर आधारित मांस और अंडे के विकल्प बना रहे हैं।
सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी सेंटर (CCMB) को DBT से संवर्धित मांस पर अनुसंधान के लिए ₹4.5 करोड़ का अनुदान मिला है।
हालाँकि, FSSAI द्वारा इन नई खाद्य श्रेणियों — जैसे कि संवर्धित मांस या किण्वन आधारित प्रोटीन — के लिए अभी तक स्पष्ट नियम नहीं बनाए गए हैं, जो इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है।
अंतर्राष्ट्रीय स्थिति:
दुनिया के कई देश इस दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।
जापान ने 1980 के दशक में ही फंक्शनल फूड्स की अवधारणा और उसके नियमन की रूपरेखा तैयार की थी।
सिंगापुर ने वर्ष 2020 में संवर्धित चिकन की व्यावसायिक बिक्री को मंजूरी देने वाला पहला देश बनकर इतिहास रचा।
चीन ने वैकल्पिक प्रोटीन को अपनी खाद्य सुरक्षा और नवाचार नीति का हिस्सा बनाया है।
यूरोपीय संघ (EU) ने “फार्म टू फोर्क (Farm to Fork)” रणनीति के तहत टिकाऊ प्रोटीन उत्पादन में बड़े पैमाने पर निवेश किया है।
भारत ने भी शुरुआत की है, परंतु अभी नियामक स्पष्टता, उपभोक्ता स्वीकृति और तकनीकी निवेश के मामले में पीछे है।
प्रमुख चुनौतियाँ:
नियमों की अस्पष्टता: FSSAI के दिशा-निर्देशों की कमी से उद्योग में भ्रम है।
जनता का अविश्वास: “लैब में बने भोजन” के प्रति समाज में अभी भी संदेह है।
कौशल की कमी: जैव-उत्पादन (biomanufacturing) के लिए कृषि और औद्योगिक क्षेत्र में नई तकनीकी कौशल की आवश्यकता होगी।
बाजार में एकाधिकार का खतरा: यदि सही नियमन न हुआ तो कुछ बड़ी कंपनियाँ इस क्षेत्र पर हावी हो सकती हैं।
उच्च लागत और अवसंरचना की कमी: अनुसंधान और उत्पादन इकाइयों की स्थापना महंगी है और विशेषज्ञता की जरूरत है।
आगे की राह
भारत को पोषण क्रांति सफल बनाने के लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।
सबसे पहले, FSSAI के तहत एक स्पष्ट राष्ट्रीय नियामक ढांचा बनाया जाए जिसमें नई खाद्य श्रेणियों की परिभाषा, सुरक्षा मूल्यांकन और लेबलिंग मानक शामिल हों।
दूसरे, कृषि, जैव-प्रौद्योगिकी और खाद्य मंत्रालयों के बीच समन्वय आवश्यक है ताकि नीतियाँ एक दिशा में काम करें।
तीसरे, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership) के माध्यम से जैव-निर्माण तकनीकों का विस्तार किया जा सकता है।
चौथे, जन-जागरूकता और शिक्षा के माध्यम से जनता में “लैब फूड” के प्रति विश्वास बढ़ाना जरूरी है।
और अंत में, किसानों को नई मूल्य श्रृंखलाओं (Value Chains) में शामिल किया जाए ताकि तकनीकी प्रगति का लाभ समाज के हर स्तर तक पहुँचे।
निष्कर्ष:
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