PIB: प्रकाशित – 19 फरवरी 2026
CSIR–National Institute for Interdisciplinary Science and Technology (CSIR–NIIST) ने 19 फरवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित CSIR मुख्यालय में “CSIR–NIIST टेक कनेक्ट: लैब टू मार्केट” कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में 11 प्रौद्योगिकियों का उद्योग साझेदारों को हस्तांतरण किया गया तथा एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।
इस अवसर पर वरिष्ठ अधिकारियों सहित डॉ. एन. कलैसेल्वी, सचिव, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR) तथा महानिदेशक, Council of Scientific and Industrial Research (CSIR), उद्योग प्रतिनिधियों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया।

यह विकास महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की सार्वजनिक अनुसंधान संस्थाओं में पारंपरिक अनुसंधान एवं विकास (R&D) से नवाचार-आधारित, बाजार-उन्मुख अनुसंधान की ओर रणनीतिक परिवर्तन को दर्शाता है। यह कार्यक्रम भारत की “लैब-टू-मार्केट” प्रणाली को सुदृढ़ करने का प्रतीक है और आत्मनिर्भरता, सतत विकास, पोषण सुरक्षा तथा स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण जैसे सरकारी लक्ष्यों को मजबूत करता है।
यह चर्चा में क्यों है
यह कार्यक्रम निम्नलिखित प्रमुख कारणों से चर्चा में है:

कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएँ
1. रणनीतिक नीतिगत दिशा: R&D से R&D नवाचार की ओर: डॉ. एन. कलैसेल्वी ने पारंपरिक अनुसंधान एवं विकास (R&D) से “R&D नवाचार” की ओर एक महत्वपूर्ण परिवर्तन पर बल दिया। पारंपरिक R&D जहाँ वैज्ञानिक जिज्ञासा से शुरू होता है, वहीं R&D नवाचार बाजार की आवश्यकताओं और सामाजिक चुनौतियों की पहचान से आरंभ होता है। इस परिवर्तन के अंतर्गत:
2. प्रमुख हस्तांतरित प्रौद्योगिकियाँ
कार्यक्रम के दौरान हस्तांतरित की गई प्रौद्योगिकियाँ बहु-विषयी नवाचार का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
(a) उच्च-प्रोटीन, कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स चावल: सबसे महत्वपूर्ण हस्तांतरणों में से एक था ऐसा चावल, जिसे आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 से समृद्ध किया गया है। इस चावल में प्रोटीन की मात्रा अधिक है तथा इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम है।
महत्व:
(b) कम-सोडियम नमक प्रौद्योगिकी: सोडियम की मात्रा को काफी कम करने वाला नमक विकसित किया गया। इसके आगे के अनुसंधान और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए एक MoU पर हस्ताक्षर किए गए।
महत्व:
(c) इंस्टेंट कॉफी फोम प्रौद्योगिकी: यह नई तकनीक ऐसी इंस्टेंट कॉफी से संबंधित है, जो बिना दूध मिलाए उच्च तापमान पर भी झाग (फोम) बनाए रखती है।
प्रासंगिकता:
(d) सतत एवं हरित प्रौद्योगिकियाँ: अन्य हस्तांतरित प्रौद्योगिकियों में शामिल हैं:
ये नवाचार निम्नलिखित में योगदान देते हैं:
एनआरडीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक कमोडोर अमित रस्तोगी (सेवानिवृत्त) ने CSIR और National Research Development Corporation (NRDC) के बीच नई ऊर्जा और सहयोग को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि NRDC अब केवल पारंपरिक लाइसेंसिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने अपनी भूमिका का विस्तार करते हुए नवाचार को बाजार तक पहुँचाने के लिए एक व्यापक तंत्र विकसित किया है।

NRDC अब निम्न क्षेत्रों में सक्रिय सहयोग प्रदान कर रहा है:
इसके अतिरिक्त, NRDC एक राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी अनुवाद संगठन (National Technology Translation Organization) स्थापित करने तथा एक AI-सक्षम प्रौद्योगिकी एक्सचेंज प्लेटफॉर्म विकसित करने की योजना बना रहा है, जिससे शोध परिणामों की दृश्यता, मूल्यांकन और बाजार में रूपांतरण की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हो सके।
व्यापक संदर्भ: भारत का नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र
भारत ने पारंपरिक रूप से बुनियादी और मौलिक अनुसंधान में मजबूत क्षमताएँ प्रदर्शित की हैं, विशेषकर सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित प्रयोगशालाओं और राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों में। फिर भी, वैज्ञानिक खोजों को व्यावसायिक रूप से सफल उत्पादों और बड़े पैमाने पर लागू की जा सकने वाली प्रौद्योगिकियों में परिवर्तित करने में देश को ऐतिहासिक रूप से चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
अनेक प्रौद्योगिकियाँ, जो सार्वजनिक प्रयोगशालाओं में विकसित हुईं, उद्योग से कमजोर जुड़ाव, स्केल-अप और पायलट उत्पादन के लिए सीमित वित्तीय सहायता, अपर्याप्त बौद्धिक संपदा प्रबंधन ढाँचे तथा बाजार-उन्मुख अनुसंधान योजना की कमी के कारण व्यापक उपयोग में नहीं आ सकीं। परिणामस्वरूप, प्रयोगशाला अनुसंधान और औद्योगिक अनुप्रयोग के बीच की खाई ने वैज्ञानिक प्रगति के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव को सीमित किया।
हाल ही में CSIR–National Institute for Interdisciplinary Science and Technology द्वारा आयोजित “लैब टू मार्केट” पहल इन दीर्घकालिक कमियों को दूर करने का एक संगठित प्रयास दर्शाती है। यह पहल संरचित व्यावसायीकरण रणनीतियों और उद्योग हितधारकों के साथ मजबूत सहभागिता की दिशा में परिवर्तन का संकेत देती है।
Council of Scientific and Industrial Research (CSIR) के अंतर्गत अब संस्थागत सुधार स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं, जिनमें बाहरी राजस्व सृजन को मजबूत करना, केवल सरकारी अनुदानों पर निर्भरता कम करना, तथा कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) आधारित अनुसंधान परियोजनाओं का विस्तार शामिल है।
साथ ही, बड़े उद्योगों तक सीमित सहयोग के बजाय स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (SMEs) को नवाचार साझेदार के रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है। इनोवेशन, टेक्नोलॉजी और एंटरप्रेन्योरशिप हब की स्थापना बाजार-उन्मुख समाधानों को विकसित करने और प्रौद्योगिकी-आधारित उद्यमों को समर्थन देने की सक्रिय नीति को दर्शाती है।
समग्र रूप से, ये सभी कदम भारत में एक अधिक गतिशील, उद्योग-संबद्ध और व्यावसायीकरण-उन्मुख नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की दिशा में रणनीतिक परिवर्तन को इंगित करते हैं।
राष्ट्रीय महत्व
यह कार्यक्रम अनेक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है।
आगे की चुनौतियाँ
हालाँकि उल्लेखनीय प्रगति हुई है, फिर भी कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
फिर भी, Council of Scientific and Industrial Research (CSIR) और National Research Development Corporation (NRDC) द्वारा प्रदान किया जा रहा संरचित समर्थन सफल व्यावसायीकरण की संभावनाओं को काफी हद तक मजबूत करता है।
विश्लेषणात्मक आकलन
CSIR–NIIST द्वारा आयोजित “लैब टू मार्केट” कार्यक्रम केवल एक औपचारिक या सामान्य प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह भारत की सार्वजनिक अनुसंधान प्रणाली में एक गहरे सांस्कृतिक और संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देता है। परंपरागत रूप से, सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित प्रयोगशालाएँ मुख्यतः ज्ञान सृजन, शोध प्रकाशन और शैक्षणिक उपलब्धियों पर केंद्रित रहती थीं। यद्यपि ये पहलू अब भी महत्वपूर्ण हैं, किंतु अब उनका दायरा व्यापक आर्थिक और सामाजिक परिणामों तक विस्तारित किया जा रहा है।
यह कार्यक्रम मापनीय आर्थिक प्रभाव, अनुवादात्मक अनुसंधान और उद्योग के साथ मजबूत एकीकरण की दिशा में स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है। अब ध्यान इस बात पर है कि प्रयोगशाला में विकसित खोजों को सत्यापित किया जाए, उन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जाए, उनका व्यावसायीकरण किया जाए और उन्हें वास्तविक बाजार आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाए। इस दिशा में नवाचार और उद्यमिता हब की स्थापना तथा सरकारी अनुदानों से परे राजस्व स्रोतों के विविधीकरण के प्रयास संस्थागत पुनर्स्थापन को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
कार्यक्रम को “प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का उत्सव” बताते हुए निदेशक डॉ. सी. आनंदहरमाकृष्णन ने संस्थान के बढ़ते आत्मविश्वास और परिपक्वता को रेखांकित किया। यह प्रयोगशाला-केंद्रित विज्ञान से उद्योगोन्मुख नवाचार की ओर परिवर्तन को दर्शाता है और सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों की भूमिका को आर्थिक विकास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और सामाजिक प्रभाव के प्रमुख इंजन के रूप में सुदृढ़ करता है।