द हिंदू : प्रकाशित – 15 दिसंबर 2025
क्यों चर्चा में है?
हाल ही में रणवीर अल्लाहबादिया बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई के दौरान, सर्वोच्च न्यायालय ने अनियमित ऑनलाइन सामग्री को लेकर चिंता व्यक्त की और डिजिटल कंटेंट के विनियमन हेतु तटस्थ स्वायत्त निकायों के गठन का सुझाव दिया। न्यायालय ने मौजूदा स्व-नियामक तंत्रों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाए तथा सरकार से ड्राफ्ट नियामक दिशानिर्देश सार्वजनिक परामर्श हेतु जारी करने को कहा। इस हस्तक्षेप से न्यायिक अतिक्रमण, पूर्व प्रतिबंध (Prior Restraint) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक सीमाओं पर बहस तेज हो गई है।
अभिव्यक्ति के विनियमन हेतु मौजूदा कानूनी ढांचा
भारत में अभिव्यक्ति के विनियमन हेतु एक व्यापक वैधानिक ढांचा पहले से मौजूद हैः
एक प्रमुख चिंता यह है कि आईटी नियम, 2021 प्रकाशकों से “यथोचित सावधानी” बरतने की अपेक्षा कर पूर्व प्रतिबंध के तत्व लागू करते हैं। ऐसे अस्पष्ट मानदंड अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अभिव्यक्ति पर लगाए गए प्रतिबंध अनुपातिकता परीक्षण पर खरे उतरने चाहिए।
न्यायिक अतिक्रमण और कार्यक्षेत्र का विस्तार
अनुच्छेद 19 के अंतर्गत संवैधानिक सीमाएं
वैश्विक तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य
भारतीय न्यायिक परंपरा में आत्म-संयम
भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र न्यायिक आत्म-संयम पर बल देता है। आदर्श हाउसिंग सोसायटी मामला (2018) में सर्वोच्च न्यायालय ने फिल्मों के डिस्क्लेमर संबंधी निर्देश देने से इंकार करते हुए इसे वैधानिक प्राधिकरणों का क्षेत्र माना। संविधान सभा की बहसें भी दर्शाती हैं कि न्यायालयों को प्रतिबंधों की तर्कसंगतता का अंतिम निर्णायक, न कि विधि निर्माता माना गया था। पंडित ठाकुर दास भार्गव ने स्पष्ट किया था कि न्यायपालिका का कार्य प्रतिबंधों की वैधता की समीक्षा करना है, न कि उन्हें गढ़ना।
अभिव्यक्ति के न्यायिक विनियमन के जोखिम
अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप से पूर्व प्रतिबंध, मामलों से नीति निर्माण की ओर बढ़ता हुआ मिशन विस्तार, तथा सत्तावादी दुरुपयोग की संभावनाएँ बढ़ सकती हैं। साथ ही, डिजिटल मंचों की जटिलताओं को समझने में न्यायालयों को तकनीकी सीमाओं का सामना करना पड़ सकता है। संवैधानिक विद्वान डेविड लैंडाउ ने चेतावनी दी है कि जब न्यायालय अपने संवैधानिक दायरे से बाहर जाते हैं, तो लोकतांत्रिक क्षरण संभव हो जाता है।
आगे की राह
निष्कर्ष
न्यायालय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सर्वश्रेष्ठ रक्षा तब करते हैं, जब वे यह सुनिश्चित करते हैं कि सभी प्रतिबंध अनुच्छेद 19(2) के अनुरूप हों। न्यायिक आत्म-संयम, विधायी उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक जवाबदेही—ये तीनों मिलकर डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे मजबूत संरक्षक हैं।f
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति यून सुक-योल के खिलाफ मार्शल लॉ मामले में महाभियोग प्रस्ताव
Read Moreयूक्रेन रूस के कब्ज़े से अपने आखिरी कोयला भंडार को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है:
Read More2030 तक भारत की कोयले की मांग बढ़कर 1.5 बिलियन टन हो जाएगी
Read Moreबिहार राज्य की मुख्य नदियां
Read Moreबिहार में अति पिछड़ी जातियों की राजनीति?
Read More