ट्रम्प का तर्क है कि चीन ग्रीनलैंड के लिए खतरा है, लेकिन विश्लेषक इससे सहमत नहीं हैं:

ट्रम्प का तर्क है कि चीन ग्रीनलैंड के लिए खतरा है, लेकिन विश्लेषक इससे सहमत नहीं हैं:

Static GK   /   ट्रम्प का तर्क है कि चीन ग्रीनलैंड के लिए खतरा है, लेकिन विश्लेषक इससे सहमत नहीं हैं:

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द हिंदू: 14 जनवरी 2026 को प्रकाशित:

 

यह समाचार क्यों महत्वपूर्ण है?

यह मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह आर्कटिक भू-राजनीति, अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता, जलवायु परिवर्तन और राजनीतिक वक्तव्यों में रणनीतिक अतिशयोक्ति के संगम को दर्शाता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बार-बार यह दावा किया गया कि चीन ग्रीनलैंड के लिए एक गंभीर सैन्य खतरा है—यहाँ तक कि बीजिंग से द्वीप को सुरक्षित रखने के लिए बल प्रयोग का संकेत भी दिया गया—जिससे यह बहस फिर से शुरू हो गई है कि क्या चीन की आर्कटिक गतिविधियाँ वास्तव में इतनी चिंता का कारण हैं।

यह समाचार इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि चीन अचानक ग्रीनलैंड पर प्रभुत्व स्थापित कर रहा है, बल्कि इसलिए कि यह दिखाता है कि खतरे की धारणा और जमीनी वास्तविकता के बीच कितना बड़ा अंतर हो सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो जलवायु परिवर्तन के कारण रणनीतिक रूप से अधिक मूल्यवान होते जा रहे हैं। ग्रीनलैंड एक ऐसे प्रतीकात्मक और रणनीतिक मंच के रूप में उभरा है जहाँ महाशक्तियों की चिंताएँ प्रक्षेपित की जा रही हैं, भले ही कथित खतरे की वास्तविक भौतिक उपस्थिति सीमित ही क्यों न हो।

 

ग्रीनलैंड और आर्कटिक का रणनीतिक महत्व:

ग्रीनलैंड एक विशिष्ट भू-रणनीतिक स्थिति में स्थित है। कम जनसंख्या होने के बावजूद, यह उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक के प्रमुख वायु और समुद्री मार्गों के बीच स्थित है, जिससे यह अर्ली वार्निंग सिस्टम, मिसाइल रक्षा और ट्रांस-अटलांटिक सैन्य लॉजिस्टिक्स के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने लंबे समय से इस महत्व को पहचाना है और शीत युद्ध काल से वहाँ अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखी है।

सैन्य भूगोल से आगे, ग्रीनलैंड अपने विशाल खनिज संसाधनों, विशेषकर दुर्लभ मृदा तत्वों (रेयर अर्थ एलिमेंट्स) के कारण भी अत्यधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों और उन्नत हथियार प्रणालियों जैसी आधुनिक तकनीकों के लिए आवश्यक हैं। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, पहले दुर्गम रहे संसाधन और समुद्री मार्ग अब उपयोगी बनते जा रहे हैं। इससे आर्कटिक एक जमे हुए सीमांत क्षेत्र से बदलकर भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के उभरते केंद्र में परिवर्तित हो रहा है। यही परिवर्तन समझाता है कि चीन जैसे गैर-आर्कटिक देशों सहित वैश्विक शक्तियाँ इस क्षेत्र में बढ़ती रुचि क्यों दिखा रही हैं।

 

चीन की आर्कटिक रणनीति: प्रभुत्व के बिना महत्वाकांक्षा:

आर्कटिक में चीन की भागीदारी को सबसे बेहतर रूप में दीर्घकालिक, सतर्क और मुख्यतः आर्थिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण के रूप में समझा जा सकता है, न कि खुले तौर पर सैन्य रणनीति के रूप में। वर्ष 2018 में बीजिंग ने औपचारिक रूप से पोलर सिल्क रोड की शुरुआत की, जिसे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का आर्कटिक विस्तार माना गया। इसके माध्यम से चीन भविष्य के व्यापार मार्गों को सुरक्षित करना, ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाना और आर्कटिक शासन में अपनी आवाज़ स्थापित करना चाहता है।

चीन ने निम्नलिखित क्षेत्रों में निवेश किया है:

नॉर्डिक देशों में वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र

आइसब्रेकर और ध्रुवीय अनुसंधान पोत

 

आर्कटिक नौवहन और अवलोकन के लिए उपग्रह प्रणालियाँ:

ये पहलें निस्संदेह चीन की उपस्थिति को बढ़ाती हैं, लेकिन विशेषकर ग्रीनलैंड में इन्हें क्षेत्रीय नियंत्रण या सैन्यीकरण नहीं कहा जा सकता। विश्लेषकों का लगातार कहना है कि चीन के पास न तो आवश्यक अवसंरचना है और न ही राजनीतिक पहुँच, जिससे वह आर्कटिक में स्वतंत्र रूप से रणनीतिक स्तर पर कार्य कर सके।

 

ट्रंप के दावे और वास्तविकता के बीच अंतर:

डोनाल्ड ट्रंप का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि यदि अमेरिका हस्तक्षेप नहीं करता, तो ग्रीनलैंड चीनी सैन्य शक्ति का अड्डा बन सकता है। हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह कथा चीन की मंशा और क्षमता—दोनों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है।

ग्रीनलैंड के आसपास चीनी नौसैनिक अड्डों, पनडुब्बियों या विध्वंसक जहाज़ों की तैनाती का कोई प्रमाण नहीं है। यहाँ तक कि पश्चिमी सुरक्षा चिंताओं के प्रति सहानुभूति रखने वाले खुफिया विश्लेषक भी चीन की आर्कटिक सैन्य उपस्थिति को अधिकतम प्रतीकात्मक ही मानते हैं। यह सुझाव कि चीनी युद्धपोत ग्रीनलैंड के आसपास स्वतंत्र रूप से संचालन कर सकते हैं, नाटो की निगरानी, डेनमार्क की संप्रभुता और आवश्यक लॉजिस्टिक समर्थन की अनुपस्थिति को नजरअंदाज करता है।

यह अंतर रणनीतिक विमर्श में एक व्यापक प्रवृत्ति को उजागर करता है, जहाँ भविष्य की संभावनाओं को वर्तमान खतरों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, अक्सर आक्रामक नीतियों को उचित ठहराने के लिए।

 

आर्कटिक में चीन की पहुँच में रूस की केंद्रीय भूमिका:

एक महत्वपूर्ण तथ्य जिसे अक्सर अतिरंजित कथाओं में अनदेखा कर दिया जाता है, वह यह है कि रूस के बिना चीन आर्कटिक में सार्थक रूप से कार्य नहीं कर सकता। अमेरिका, कनाडा या नॉर्डिक देशों के विपरीत, चीन के पास आर्कटिक तटरेखा या संप्रभु पहुँच नहीं है।

2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद, मास्को आर्थिक और कूटनीतिक रूप से बीजिंग पर अधिक निर्भर हो गया। इससे रूस के आर्कटिक क्षेत्रों—विशेषकर नॉर्दर्न सी रूट (NSR)—में चीन के लिए अवसर खुले। संयुक्त गश्त, अलास्का के पास बॉम्बर उड़ानें और तटरक्षक सहयोग इस साझेदारी को दर्शाते हैं। फिर भी, यहाँ भी चीन कनिष्ठ भागीदार बना हुआ है और मुख्यतः रूसी शर्तों पर कार्य करता है। यह निर्भरता चीन की स्वायत्तता को गंभीर रूप से सीमित करती है और इस विचार को मजबूत करती है कि आर्कटिक में उसका प्रभाव शर्तों पर आधारित है, न कि प्रभुत्वपूर्ण।

 

व्यापार मार्ग और ग्रीनलैंड की केंद्रीयता का मिथक:

चीन की आर्कटिक रणनीति को लेकर अधिकांश चिंता समुद्री व्यापार मार्गों से जुड़ी है। नॉर्दर्न सी रूट पूर्वी एशिया और यूरोप के बीच एक छोटा मार्ग प्रदान करता है, जिससे यात्रा समय कम होता है और स्वेज नहर तथा मलक्का जलडमरूमध्य जैसे चोकपॉइंट्स से बचाव होता है।

लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मार्ग ग्रीनलैंड से होकर नहीं गुजरता। NSR का उपयोग करने वाले अधिकांश चीनी जहाज़ रूसी ऊर्जा संसाधनों का परिवहन करते हैं और वह भी रूसी निगरानी में। कनाडा से होकर गुजरने वाला नॉर्थवेस्ट पैसेज अभी भी व्यावसायिक रूप से अनिश्चित और कानूनी रूप से विवादित है। इसलिए यह दावा कि चीनी शिपिंग गतिविधियाँ ग्रीनलैंड की तटीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं, भौगोलिक और परिचालन आधार से रहित है।

 

संसाधन प्रतिस्पर्धा और दुर्लभ मृदा राजनीति:

ग्रीनलैंड के दुर्लभ मृदा भंडार लंबे समय से ध्यान आकर्षित करते रहे हैं, विशेषकर इसलिए क्योंकि चीन पहले से ही वैश्विक दुर्लभ मृदा प्रसंस्करण पर प्रभुत्व रखता है। इसके बावजूद, चीनी-संबद्ध कंपनियों द्वारा ग्रीनलैंड की खनन परियोजनाओं पर नियंत्रण पाने के प्रयास काफी हद तक विफल रहे हैं।

पर्यावरणीय विरोध, ग्रीनलैंड सरकार का राजनीतिक प्रतिरोध, और अमेरिका व डेनमार्क का कूटनीतिक दबाव—इन सभी ने चीनी निवेश को सीमित किया है। समय के साथ, राजनीतिक लागत आर्थिक लाभ से अधिक हो गई, जिससे बीजिंग ने आक्रामक विस्तार के बजाय अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमित करना उचित समझा। यह पैटर्न दर्शाता है कि ग्रीनलैंड चीनी विस्तार के लिए खुला मैदान नहीं, बल्कि एक अत्यधिक विनियमित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र है।

 

पश्चिमी प्रतिरोध और रणनीतिक नियंत्रण:

आर्कटिक में चीन की सीमित सफलता पश्चिमी देशों के उस व्यापक प्रयास को दर्शाती है जिसका उद्देश्य रणनीतिक निर्भरता को पहले ही रोकना है। चीनी कंपनियों की अवसंरचना बोलियों को अस्वीकार करना, दूरसंचार नेटवर्क से हुआवेई को बाहर करना, और चीनी खनन परियोजनाओं के विरुद्ध अमेरिकी लॉबिंग—ये सभी बीजिंग के प्रभाव को सीमित करने के लिए समन्वित प्रयासों का उदाहरण हैं।

इसके परिणामस्वरूप, आर्कटिक में चीन की भागीदारी अब अधिक रक्षात्मक और प्रतीकात्मक होती जा रही है, जिसका उद्देश्य नियंत्रण स्थापित करने के बजाय भविष्य के विकल्पों को सुरक्षित रखना है।

 

चीन का आधिकारिक रुख और अंतर्राष्ट्रीय कानून:

ट्रंप की टिप्पणियों के जवाब में चीन ने दोहराया कि उसकी आर्कटिक गतिविधियाँ अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप हैं और क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए हैं। यह बीजिंग की उस व्यापक रणनीति को दर्शाता है जिसमें वह कानूनी और वैज्ञानिक कथाओं के माध्यम से अपनी उपस्थिति को वैध ठहराना चाहता है, भले ही कुछ तकनीकों की द्वैध-उपयोग (ड्यूल-यूज़) प्रकृति को लेकर संदेह बना रहे।

फिर भी, वर्तमान में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि चीन आर्कटिक शासन मानदंडों का उल्लंघन कर रहा है या ग्रीनलैंड में सैन्य वृद्धि की तैयारी कर रहा है।

 

व्यापक निहितार्थ:

यह प्रकरण दर्शाता है कि आर्कटिक अब भविष्य की प्रतिद्वंद्विता का रंगमंच बन चुका है, जहाँ संभावित परिदृश्य वर्तमान भय को आकार देते हैं। यह यह भी दिखाता है कि घरेलू राजनीतिक वक्तव्य—विशेषकर चुनावी दौर में—खतरे की धारणा को किस तरह बढ़ा सकते हैं। आर्कटिक की वास्तविक चुनौती तात्कालिक सैन्यीकरण नहीं, बल्कि ऐसे मजबूत शासन तंत्रों की कमी है जो जलवायु परिवर्तन के साथ संसाधनों, समुद्री मार्गों और प्रभाव को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित कर सकें।

 

निष्कर्ष:

चीन निस्संदेह आर्कटिक में एक बड़ी भूमिका चाहता है और इसे दीर्घकालिक रणनीतिक सीमा के रूप में देखता है। हालांकि, वर्तमान साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि ग्रीनलैंड के आसपास उसकी उपस्थिति सीमित, नियंत्रित और सैन्यीकरण से बहुत दूर है। ट्रंप द्वारा प्रस्तुत आसन्न चीनी कब्जे की तस्वीर विशेषज्ञ आकलनों और प्रत्यक्ष वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती।

आर्कटिक का भविष्य नाटकीय टकरावों से नहीं, बल्कि धीमी प्रतिस्पर्धा, नियामक संघर्षों और रणनीतिक साझेदारियों से आकार लेगा—जिसमें चीन की महत्वाकांक्षाओं के मध्यस्थ के रूप में रूस की भूमिका निर्णायक बनी रहेगी।

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