द हिंदू: 22 जनवरी 2026 को प्रकाशित:
सेवा-आधारित विकास की ओर चीन का रुख:
चीन की नवीनतम आर्थिक पहल — वस्तुओं पर आधारित उपभोग से हटकर सेवाओं पर केंद्रित होने की दिशा में कदम — उसके सुधारोत्तर आर्थिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक मानी जा रही है। यह निर्णय चीनी अर्थव्यवस्था के भीतर बढ़ते संरचनात्मक दबावों को दर्शाता है और विनिर्माण, निर्यात तथा बुनियादी ढाँचे पर आधारित उसके पारंपरिक विकास मॉडल की सीमाओं को उजागर करता है। यह कदम केवल एक तात्कालिक रणनीति नहीं है, बल्कि घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों में हो रहे बदलावों के अनुरूप अर्थव्यवस्था के पुनर्संतुलन का व्यापक प्रयास है।
यह विषय समाचारों में क्यों है?
चीन उपभोग को बढ़ावा देने वाली नीतियों को अब वस्तुओं तक सीमित रखने के बजाय स्वास्थ्य सेवाओं, वृद्ध देखभाल, पर्यटन, अवकाश और मनोरंजन जैसी सेवाओं तक विस्तार देने की योजना बना रहा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब सरकारी प्रोत्साहनों के बावजूद घरेलू मांग कमजोर बनी हुई है और पारंपरिक विकास चालक — निर्यात और भारी निवेश — घटते प्रतिफल देने लगे हैं।
यह घोषणा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन के नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से यह प्रतिबद्धता जताई है कि वे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में घरेलू उपभोग की हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं और विनिर्माण-आधारित विकास पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। नीति-निर्माताओं का मानना है कि एक मजबूत सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान कर सकता है, रोजगार सृजित कर सकता है और दीर्घकालिक आर्थिक लचीलापन सुनिश्चित कर सकता है।
पृष्ठभूमि: चीन को नए विकास इंजन की आवश्यकता क्यों है:
पिछले चार दशकों से चीन की आर्थिक प्रगति निर्यात-आधारित विनिर्माण और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेश पर टिकी रही है। इस रणनीति ने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला, लेकिन इसके साथ-साथ कई संरचनात्मक असंतुलन भी पैदा हुए।
आज चीन वैश्विक विनिर्माण उत्पादन का लगभग 30% हिस्सा रखता है, जबकि वैश्विक उपभोग में उसकी हिस्सेदारी इससे कहीं कम है। घरेलू उपभोग GDP का केवल लगभग 40% है, जो वैश्विक औसत से लगभग 20 प्रतिशत अंक कम है। इसका अर्थ है कि चीन की आर्थिक वृद्धि अत्यधिक रूप से कारखानों, निर्यात और ऋण-आधारित अवसंरचना पर निर्भर है।
इसके साथ ही चीन को धीमी जनसंख्या वृद्धि, वृद्ध होती आबादी, बढ़ती श्रम लागत और कमजोर वैश्विक मांग जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रोजगार असुरक्षा, उच्च स्वास्थ्य खर्च और अपर्याप्त पेंशन व्यवस्था के कारण उपभोक्ता खर्च करने से हिचकते हैं। परिणामस्वरूप, उत्पादन मजबूत होने के बावजूद घरेलू मांग दबाव में बनी रहती है।
सेवा क्षेत्र को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है:
चीनी नीति-निर्माताओं का मानना है कि सेवा क्षेत्र टिकाऊ विकास का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है। विनिर्माण के विपरीत, सेवाएँ अधिक श्रम-प्रधान होती हैं, अधिक रोजगार सृजित करती हैं और सीधे तौर पर आय वृद्धि से जुड़ी होती हैं।
चीन की प्रति व्यक्ति आय अब लगभग 14,000 अमेरिकी डॉलर के करीब पहुँच चुकी है, जिसके कारण उपभोग का स्वरूप स्वाभाविक रूप से वस्तुओं से हटकर सेवाओं की ओर बढ़ रहा है — जैसे स्वास्थ्य, यात्रा, वेलनेस, शिक्षा और मनोरंजन।
जनसांख्यिकीय परिवर्तन, विशेषकर जनसंख्या का वृद्ध होना, इस प्रवृत्ति को और तेज कर रहा है। आँकड़े दर्शाते हैं कि 2025 में सेवाओं पर खर्च कुल घरेलू उपभोग का 46% से अधिक हो गया, जबकि एक दशक पहले यह लगभग 40% था। इसके विपरीत, उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि काफी धीमी हो गई है, जो टिकाऊ वस्तुओं की संतृप्ति को दर्शाती है।
नीतिगत उपाय जो अपनाए जा रहे हैं:
इस परिवर्तन को गति देने के लिए चीन सरकार राजकोषीय, मौद्रिक और नियामक उपायों का मिश्रण अपनाने की योजना बना रही है।
सरकार वस्तुओं के बजाय सेवाओं — जैसे वृद्ध देखभाल, स्वास्थ्य सेवाएँ, पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियाँ — पर सब्सिडी देने पर विचार कर रही है। सेवा प्रदाताओं के लिए ब्याज सब्सिडी, घरेलू देखभाल हेतु वाउचर और नर्सिंग होम व वेलनेस सुविधाओं के लिए वित्तीय सहायता भी प्रस्तावित है।
चीन के केंद्रीय बैंक ने पहले ही 500 अरब युआन की पुनर्वित्त सुविधा शुरू कर दी है, जिसका उद्देश्य वृद्ध देखभाल और सेवा उपभोग को प्रोत्साहित करना है। इसके अतिरिक्त, सरकार लंबी सवैतनिक छुट्टियों और क्रूज पर्यटन जैसे उच्च-स्तरीय अवकाश गतिविधियों पर प्रतिबंधों में ढील देने पर भी विचार कर रही है।
रणनीति के समक्ष संरचनात्मक चुनौतियाँ:
इन उपायों के बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि सेवा-आधारित उपभोग को बढ़ावा देना आसान नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती है घरेलू आय की धीमी वृद्धि। जब तक आय में ठोस वृद्धि नहीं होती, उपभोक्ता खर्च को लेकर सतर्क बने रहेंगे।
दूसरी बड़ी समस्या है कमजोर सामाजिक सुरक्षा तंत्र। स्वास्थ्य, शिक्षा और वृद्धावस्था देखभाल पर अधिक निजी खर्च लोगों को बचत करने के लिए मजबूर करता है, जिससे उपभोग घटता है।
इसके अलावा, स्थानीय सरकारों का झुकाव अब भी विनिर्माण की ओर है क्योंकि वहाँ कर संग्रह आसान होता है और रोजगार सृजन अधिक स्पष्ट होता है। सेवा क्षेत्र को नियंत्रित करना और कर लगाना अपेक्षाकृत कठिन है, जिससे उसे प्राथमिकता कम मिलती है।
सेवा क्षेत्र स्वयं भी कुशल श्रमिकों की कमी, नियामकीय बाधाओं और गुणवत्ता असमानताओं जैसी आपूर्ति-पक्षीय समस्याओं से जूझ रहा है।
आर्थिक और वैश्विक प्रभाव:
यदि चीन का यह परिवर्तन सफल होता है, तो इसके वैश्विक प्रभाव भी व्यापक होंगे। निर्यात पर निर्भरता कम होने से वैश्विक व्यापार असंतुलन घटेगा और व्यापार तनावों में कमी आ सकती है।
एक उपभोग-आधारित चीन अधिक सेवाओं का आयात करेगा, पर्यटन बढ़ाएगा और वैश्विक सेवा बाजारों में गहराई से जुड़ जाएगा। हालांकि, यदि पुनर्संतुलन असफल रहा, तो इससे औद्योगिक अधिशेष, ऋण संकट और अपस्फीति का जोखिम बढ़ सकता है। साथ ही, अमेरिका और यूरोप के साथ व्यापार तनाव और बढ़ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मूल्यांकन:
अर्थशास्त्रियों की राय में सुधार की दिशा सही है, लेकिन उसका क्रियान्वयन धीमा होगा। HSBC के फ्रेड न्यूमैन के अनुसार, उपभोग वृद्धि नीतिगत प्रोत्साहनों से अधिक आय वृद्धि पर निर्भर करती है। ING के लिन सोंग का मानना है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना पुनर्संतुलन अधूरा रह जाएगा। वहीं S&P ग्लोबल के विश्लेषकों के अनुसार, स्थानीय सरकारों की विनिर्माण-प्रधान सोच इस बदलाव की गति को धीमा कर सकती है।
निष्कर्ष:
सेवा-आधारित विकास की ओर चीन का झुकाव उसकी आर्थिक रणनीति में एक निर्णायक बदलाव को दर्शाता है। यह स्वीकारोक्ति है कि निवेश और निर्यात पर आधारित पुराना मॉडल अब अपनी सीमाओं पर पहुँच चुका है। यद्यपि सेवा क्षेत्र सतत विकास का मार्ग प्रदान करता है, परंतु इसकी सफलता आय वितरण, सामाजिक सुरक्षा और प्रशासनिक सुधारों पर निर्भर करेगी।
यह परिवर्तन धीरे-धीरे होगा, न कि अचानक। लेकिन यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह अगले दशक में न केवल चीन की विकास गाथा को नई दिशा देगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है।