मलेरिया टीकाकरण की चुनौतियाँ, क्योंकि उन्मूलन संभव हो गया है:

मलेरिया टीकाकरण की चुनौतियाँ, क्योंकि उन्मूलन संभव हो गया है:

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द हिंदू: 14 फरवरी 2025 को प्रकाशित:

 

चर्चा में क्यों है?

WHO ने हाल ही में जॉर्जिया को 45वां मलेरिया मुक्त देश घोषित किया, जो एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य उपलब्धि है।

इसके बावजूद, मलेरिया का टीकाकरण अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, क्योंकि उपलब्ध टीके सीमित प्रभावशीलता दिखाते हैं।

सवाल उठता है कि अगर स्मॉलपॉक्स का उन्मूलन हो सकता है, तो मलेरिया क्यों नहीं?

 

प्रमुख बिंदु

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: 1897 में रोनाल्ड रॉस ने साबित किया कि मच्छर प्लाज्मोडियम परजीवी के वाहक हैं, जिससे मलेरिया फैलता है।

वैज्ञानिक चुनौती: मलेरिया के लिए टीका विकसित करना कठिन है क्योंकि प्लाज्मोडियम एक जटिल परजीवी है, जो कई जीवन चक्र चरणों में बदलता रहता है।

 

टीकों की सीमाएँ:

RTS,S टीका: WHO द्वारा स्वीकृत पहला मलेरिया टीका, लेकिन इसकी सिर्फ 36% प्रभावशीलता है।

नए टीके जैसे R21/Matrix-M और PfSPZ आशाजनक हैं लेकिन अभी भी कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

मलेरिया परजीवी की अनुकूलन क्षमता: यह परजीवी जल्दी उत्परिवर्तित (म्यूटेट) होकर प्रतिरक्षा तंत्र को चकमा दे सकता है, जिससे दीर्घकालिक प्रतिरक्षा कठिन हो जाती है।

अनुदान की कमी: मलेरिया मुख्य रूप से गरीब देशों में होता है, इसलिए इसका अनुसंधान पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं प्राप्त कर पाता।

जलवायु परिवर्तन एवं पुनरुत्थान: मच्छरों के नए आवास विकसित होने से मलेरिया का प्रसार बढ़ सकता है, जिससे इसका उन्मूलन और कठिन हो जाएगा।

 

प्रभाव / संभावित परिणाम

स्वास्थ्य क्षेत्र:

कम प्रभावी टीकों के कारण मलेरिया अभी भी अफ्रीका और दक्षिण एशिया में मौतों का प्रमुख कारण बना हुआ है।

समग्र रणनीति की आवश्यकता जिसमें टीकाकरण, मच्छर नियंत्रण और प्रभावी दवाएँ शामिल हों।

आर्थिक प्रभाव:

मलेरिया के कारण कार्यशीलता में कमी आती है, जिससे प्रभावित देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर होती है।

स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च बढ़ता है, जिससे गरीब देशों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

दवा उद्योग:

निजी कंपनियाँ मलेरिया अनुसंधान में कम निवेश करती हैं क्योंकि इसमें मुनाफे की संभावना कम होती है।

सरकारों और वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों को अनुसंधान में अधिक निवेश करना होगा।

 

प्रमुख चुनौतियाँ

कम प्रभावशीलता वाले टीके: RTS,S जैसे टीके अन्य बीमारियों (जैसे खसरा) की तुलना में काफी कम प्रभावी हैं।

जीवन चक्र की जटिलता: प्लाज्मोडियम परजीवी मानव और मच्छर दोनों में विकसित होता है, जिससे टीके को कई चरणों पर काम करना पड़ता है।

तेज़ उत्परिवर्तन दर: परजीवी अपनी सतह प्रोटीन को बदलकर प्रतिरक्षा तंत्र को धोखा दे सकता है।

लॉजिस्टिक चुनौतियाँ: RTS,S कई डोज़ में दिया जाता है, जिससे ग्रामीण और संसाधन-विहीन क्षेत्रों में इसे वितरित करना मुश्किल होता है।

अनुसंधान के लिए धन की कमी: चूँकि यह रोग मुख्य रूप से गरीब देशों में होता है, इसलिए इसकी रिसर्च को पर्याप्त आर्थिक सहयोग नहीं मिलता।

 

आगे की राह

बेहतर टीकों का विकास:

दूसरी पीढ़ी के टीकों (जैसे R21/Matrix-M, PfSPZ) को विकसित करने में तेजी लाई जाए।

संक्रमण रोकने वाले टीके बनाए जाएँ जो मच्छरों को मलेरिया फैलाने से रोकें।

अनुसंधान और वित्त पोषण बढ़ाना:

WHO, सरकारें और निजी संस्थान अधिक धन निवेश करें।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से शोध कार्य को बढ़ावा दिया जाए।

समग्र रोकथाम रणनीति:

मच्छर नियंत्रण उपायों को बढ़ाना (कीटनाशकों, जाल, जेनेटिक बदलाव वाले मच्छरों का उपयोग)।

प्रभावी उपचारों तक अधिक लोगों की पहुँच सुनिश्चित करना।

वैश्विक सहयोग:

विभिन्न देश शोध, संसाधन और रणनीतियों को साझा करके मलेरिया उन्मूलन को गति दें।

 

निष्कर्ष:

मलेरिया का उन्मूलन संभव है, लेकिन इसके लिए बेहतर टीकों, अधिक वित्तीय निवेश और समग्र नियंत्रण उपायों की आवश्यकता होगी। RTS,S पहला बड़ा कदम था, लेकिन अधिक प्रभावी टीकों और मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के बिना मलेरिया का पूरी तरह से उन्मूलन मुश्किल रहेगा।

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