द हिंदू: 7 मई 2025 को प्रकाशित:
क्यों चर्चा में है?
ताइवान डॉलर सहित कई एशियाई मुद्राओं में अचानक तेजी आई है, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि एशियाई देश अब अपने व्यापार अधिशेष को अमेरिकी डॉलर में निवेश करने की परंपरा से हट रहे हैं।
क्या हो रहा है?
एशिया में अमेरिकी डॉलर की भारी बिक्री हो रही है, जिससे ताइवान डॉलर, सिंगापुर डॉलर, दक्षिण कोरियाई वॉन और चीनी युआन जैसी मुद्राएँ मजबूत हो रही हैं। इससे डॉलर पर वैश्विक भरोसा कमजोर हो रहा है।
ऐतिहासिक संदर्भ
1997-98 के एशियाई वित्तीय संकट के बाद एशियाई देशों ने बड़े पैमाने पर अमेरिकी डॉलर भंडार बनाना शुरू किया और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में निवेश किया। अब यह प्रवृत्ति उलटी होती दिख रही है।
कारण और प्रभाव
कारण:
ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीतियों से एशियाई निर्यात कम हुआ।
अमेरिका में संभावित मंदी की आशंका।
एशिया में विदेशी मुद्रा भंडार अधिक होना।
एशियाई देशों में कम ब्याज दरें।
प्रभाव:
रणनीतिक महत्व
यह "डॉलर-मुक्तिकरण" (De-dollarization) की शुरुआत हो सकती है। एशियाई देश अधिक आत्मनिर्भर हो सकते हैं और क्षेत्रीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का उपयोग बढ़ा सकते हैं।
बाजार की प्रतिक्रिया
बड़े बैंक और निवेशक अब अमेरिकी डॉलर से दूरी बना रहे हैं। गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार निवेशक युआन को नहीं, बल्कि अब डॉलर को शॉर्ट कर रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय
लुई-विंसेंट गैव: "यह एशियाई संकट का उलटा रूप लग रहा है।"
गैरी एनजी (नैटिक्सिस): "ट्रंप की नीतियों ने अमेरिकी डॉलर परिसंपत्तियों पर विश्वास को कमजोर किया है।"
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