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" विशेषज्ञों का पिटारा / Experts Views "

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परीक्षा कुमारी

परीक्षा कुमारी का ‘स्वीकार वाद’

हम अपनी समस्त जरूरतें अपनी पसंद से छाँट छाँट कर पूरी करते है| बहुधा अपनी नापसंद को मज़बूरी में विवशता वश स्वीकार करने के बाद समय के साथ उस वस्तु की गुणवत्ता को समझ कर हम उसे पूर्णत: अपना लेते है| Read More

pariksha_kumariअनुमान गुरु

अनुमान गुरु का 'विकल्प बोध'

प्रसिद्ध फारसी कवि ‘शेख सादी’ ने मिट्टी के ढेले से उसमें छुपी खुशबू का राज़ पुछा| ढेला बोला, 'मुझमे खुशबू कहाँ ? मैं गुलाब के बाग़ में जो पड़ा था... खुशबू खुद ब खुद भर गई| इस लघु लेख का आशय मात्र यह ह Read More

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परीक्षा कुमारी का ‘स्वीकार वाद’

हम अपनी समस्त जरूरतें अपनी पसंद से छाँट छाँट कर पूरी करते है| बहुधा अपनी नापसंद को मज़बूरी में विवशता वश स्वीकार करने के बाद समय के साथ उस वस्तु की गुणवत्ता को समझ कर हम उसे पूर्णत: अपना लेते है|

हमारे चारों ओर का वातावरण हमें प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों रूप में प्रभावित करता है| दोस्त, दुश्मन, हमसफ़र, जानकार, यह सब हम स्वेच्छा से बनाते हैं| रिश्ते–नाते ईश्वर प्रदत्त हैं| उन्हें हम चाहकर भी अस्वीकार नहीं कर सकते|

युवा पीढ़ी के समक्ष ‘रोजगार’ एक तर्क का विषय है| एक भौतिक शास्त्री, स्नातकोत्तर एवं शोध कार्य का इच्छुक, एक प्रतिष्ठित बैंक में पदासीन होने से इस लिए कतरा रहा है क्योकि उसकी शैक्षिक योग्यता का रुझान पूर्णत: विपरीत दिशा में है| अब प्रश्न यह उठता है कि इतना परिश्रम करने के बाद, समस्त चयन प्रकियाओं से गुजरने के बाद उसे अपनी विजय यात्रा को उत्साह पूर्वक स्वीकार करना चाहिए या फिर अपने दूसरे विकल्प के मद्धेनजर (जो अभी अनिश्चित है) इस स्वर्णिम अवसर को ठुकरा देना चाहिए ?

परीक्षा कुमारी के अनुसार 'हाथ का स्वीकार करो, साथ ले विकल्प चलो|' बैंक की नौकरी के समानान्तर (नौकरी छोड़ कर नही), अन्य विकल्प की तैयारी यकीनन संभव है| अगर छोड़ना ही था तो इतनी मेहनत – मशक्कत क्यों की ?

सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि प्राप्त परितोष से संतुष्टि हासिल की जाए, जिससे राष्ट्र में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में कमी आए|

'जो मिला स्वीकार लो, संग ले विकल्प चलो

जल्द बाज़ी छोडकर, ख्वाब को लगाम दो|'

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अनुमान गुरु का 'विकल्प बोध'

प्रसिद्ध फारसी कवि ‘शेख सादी’ ने मिट्टी के ढेले से उसमें छुपी खुशबू का राज़ पुछा|

ढेला बोला, 'मुझमे खुशबू कहाँ ? मैं गुलाब के बाग़ में जो पड़ा था... खुशबू खुद ब खुद भर गई|

इस लघु लेख का आशय मात्र यह है कि हमें हर वस्तु, व्यक्ति, भाव, चिंतन, प्रक्रिया एवं प्रतिक्रिया की उपयोगिता एवं गुणवत्ता का आंकलन करने के बाद उसका स्वीकार अथवा तिरस्कार करना चाहिए| आंकलन के लिये मापदंड क्या हो ? यह एक जटिल विषय है| जैसे झूठ बोलना एक महान गुण है|

यह कथन किसी भी कालखंड, परिस्थिति, परिवेष अथवा संदर्भ में कदापि मान्य नहीं हो सकता| इसी प्रकार 99% प्रश्नों के सटीक उत्तर केवल एक ही विकल्प को इंगित करते हैं| और वही सही मापदंड बनता है| सारे वेद, विज्ञान, नीतिशास्त्र, कानून, ललित कलायें, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, वाणिज्य और तो और कंप्यूटर विज्ञान तक सिद्धांत बद्ध हैं जो केवल एक ही विकल्प की सटीकता को अनुमोदित करते हैं|

      गुरूजी का कथन, परीक्षाओं में प्रचलित MCQ प्रश्नों से संबंधित है जो प्रश्न पूछने वाले परीक्षक और सटीक उत्तर का चयन करने वाले परीक्षार्थी, दोनों के लिये एक महत्वपूर्ण विषय है| यह अवधारणा कि प्रश्न कभी भी गलत नहीं हो सकता है और उसका मात्र एक ही सटीक उत्तर हो सकता है, परीक्षा प्रणाली से जुडा हुआ चिरन्तन सत्य है| सरकारी परीक्षाओं के संदर्भ में भी यही मान्यता लागू हो सकती है जिसे हर परीक्षार्थी को आत्मसात कर लेना चाहिए| 

'प्रश्न पत्र पर प्रश्न चिन्ह की रीत नहीं,

सटीक उत्तर पकड़ सको तो जीत वही|'

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